#Kavita by Rajendra Bahuguna

कवि और चारण छवि

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

अब  नये-नये  चारण चुनकर चैनल मे लाओ

इन भाट,चारणो की कविता ही मनोरञ्जन है

यंहा  हल्के-फुल्के श्रोताओं  का ये व्यञ्जन हेै

सब  तारीफों  की  तुकबन्दी  के छन्द लगाओ

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

 

कोइ सही  घटना पर लिखने को तैयार नही है

अब  इन भाटो का भारत से कोइ प्यार नही है

ये सारे  चारण खुद  को भी अब कवि कहते है

इस  राजनीति  के  कीचड  में  ये सब बहते है

यदि  राष्ट्र  कवि हो,ढूंढो वतन के सडते घावों

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

 

यंहा  बडे-बडे  मञ्चो  पर  कवि नीलाम हुये हैं

इस परम्परा  में चारण  अब  तक आम हुये हैं

जब  साहित्य  मरा  हैे, इनके  उँचे दाम हुये है

यंहा अययासी  के  होटल  चारण  धाम हुये हैं

ये  मेकप  करके कथा मञ्च पर मत दोहराओ

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

 

तुम एक ही कविता  हर  मञ्चो से ही गाते हो

अब  ये  दुर्भाग्य  है  भीडो को तुम ही भाते हो

जो शुद्ध कवि  हैं उन  का  अब उपयोग नही है

उदगार हृदय की कविता है ,ये उद्योग नही है

हे  भाट ,चारणो  कविता की  ना हाट लगाओ

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

 

अब चारण  के घर चैनल  भी चलकर जाते हैं

क्यो हर  चैनल पर चारण ही  कविता गाते हेैं

क्यो ये सब मां शारदा  को माया से बेच रहे हैं

क्यो हम कवियो की  चमडी चारण खैच रहे हेैं

अब अपशब्दो की कविता से ही राष्ट्र लुभाओ

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

 

अब चुटकुले व्यंग की परम्परा को काट रहे हैं

क्यों साहित्य सूरा  को ये पैमाने ही बाट रहे है

क्यो कवि  हृदय  को  ये  चारण ही चाट रहे है

जब राष्ट्र विमुख हैं तभी तो चारण,भाट रहे हेैं

हे  हृदय  मर्म  के  कवियो जागो  आगे आओ

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

 

हर  कवि  राष्ट्र में  क्रान्ति-दूत  दर्पण होता है

हर  अहिसुष्ण  पर  कवि हृदय हरदम रोता है

हर कवि राष्ट्र  में बीज  सरसता के ही बोता है

जब कवि जगा हो तभी  राष्ट्र सुख से सोता है

कवि आग के शब्द समझकर अमल मे लाओ

अब ये भाटों का भक्ति-काल है कविता गाओ

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

मो0 9897399815

Leave a Reply

Your email address will not be published.