#Kavita by Rajendra Bahuguna

आज के सन्यास पर कठोर शब्दों से चोट की है,शायद राजनितिक लोग इस रचना को ना समझ पायें।

 

सन्यास

सन्यस्त का लक्षण यही है तन  भरा हो मन भरा हो

ज्ञान  हो  या   भक्ति  हो  उद्यान हृदय  का  हरा हो

साकार  हो  निर्गुण  हो चाहे भाव, अन्दर का खरा हो

प्रफुल्लता  से  वाशनाऐं, हों  तिरोहित   मन  मरा हो

 

प्रारब्धता  का   दारिद्रता   से  स्मरण   होता  नही है

जागृत,हुआ दिखता तो है पर ध्यान में खोता नहीं है

तुच्छ   वैभव   का   भ्रम   भी  भाव  में, रोता नहीं है

भटकी  हुयी  हो आत्मा  तो  मन, कभी सोता नहीं है

 

आकांछा   आडम्बरों  की  क्षण  भ्रमित   होती  तो है

श्रृंगार  की  दुनिया, क्षणिक  पल्लवित   होती  तो है

विभत्सता  कब  तक  छिपेगी, दृष्टि गत् होती तो है

फिर आत्मा, उपराम   होकर  भी  द्रवित  रोती तो है

 

प्रारब्ध के इस मार्ग को अब  अवरूद्ध करना छोड़ दो

अब आड़  लेकर  धर्म  की  वैभव  में मरना  छोड़ दो

चौराहे  में  भगवान  का,  व्यवसाय  करना  छोड़ दो

आध्यात्म  के  इस  भेष  में सजना संवरना छोड़ दो

 

ब्रह्माण्ड  की  पूरी  व्यवस्था  शास्त्र  ही तो  बोलता

श्रृष्टि  का  नयता  नियन्ता  शास्त्र  ही  तो खोलता

मोक्ष  का   परिधि   विनायक शास्त्र ही  तो  डोलता

शास्त्र  से   साक्षात्  हो  हर  जीव  कर – कल्लोलता

 

सम्प्रदायों   का   भजन   कब  तक  धरा में गाओगे

रक्त – रंजित  है  धरा , कब  तक  धरा को  खाओगे

प्रारब्ध  के   इस   मार्ग  में  प्रारब्धता, कब  लाओगे

ब्रह्म  के  उद्घोष  से   क्या   ब्रह्म  को  पा जाओगे

 

क्या  सचिन   अब   सच्चिदानन्द बन कर  आयेगा

क्या नृत्य  करती  राधिका  मां  को अखाडा  भायेगा

क्या   शिवानन्दो  की   माया  को  विरक्ति  गायेगा

क्या  सनातन   धर्म   भी  धन्धा स्वयं  बन जायेगा

 

इस देश  में  पातञ्जलि  चौराहे  में क्यों बिक रहा है

हर चैनलों में  भोग  का  सामान ही क्यों दिख रहा है

अब तो बाबा मिडिया  की  हर खबर को लिख रहा है

आदमी  आध्यात्म  में  व्यवसाय को ही सिख रहा है

 

अब गेरूवा  भी  राजनीति  के  चरण  यहां चाटता है

ये गेरूवा ही  हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख, इसाई बांटता है

इस धर्म को भी मन्दिरों और  मस्जिदों से काटता है

किस कदर ये धर्म गुरू ही अब  धर्म को ही पाटता है

 

कुम्भ  के  संगम, विहंगम   बन  के  थोडा  नाच लो

अब धर्म   का  मौका  मिला  है ,हो सके  तो  बाॅंचलो

मन्थन  करो इस  नीर  का  नवनीत लो या छाछ लो

‘आग’ के  हर शब्द  को  बस, तोल लो और  जाॅंच लो।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

मो0 9897399815

Leave a Reply

Your email address will not be published.