#Kavita by Rajendra Bahuguna

नव-वर्ष 2075

स्वतंत्रता   के   बाद   नव   वर्ष  आ  गया है

अनजान थे जो इससे  उनको भी भा गया है

क्यों  रोता है  वतन आज अपनी  ही भूल से

विंध गया  मेरा   चमन   अपने  ही  शूल से

 

क्या  चैत्र  मास  का  कभी  नव वर्ष आयेगा

क्या संस्कृति   का   कोई  निष्कर्ष  आयेगा

क्या  जन   की   आत्मा  से  संघर्ष  आयेगा

क्या   देश   प्रेम   का   कभी  स्पर्स आयेगा

 

मूक  हो के  जीना   अब   हो  गया   है  धर्म

किस मूंह से  कहें  हिन्द,अब आ रही है शर्म

जान कर   भी    बोला    जाता  नहीं  है मर्म

आग  लग  रही   है   ओैर  हंस   रहा  है धर्म

 

दुर्भाग्य है इस देश का जो अब भी सो रहा है

अपनेा  को  भूल  बैठा   दुसराें को  रो रहा है

संस्कृति  पुरानी अपनी अनजाने खो रहा है

मुर्दा   गुलामियत  का  यह  देश  ढो  रहा है

 

यहां साहित्य  संस्कृति  के  विद्धान हो रहे हैं

क्यों हर  वर्ष   नवोदय   फनकार  हो  रहे हैं

भारतीयता   को  मल  –  मल   के धो  रहे हैं

अब प्रारम्भ  जनवरी  से  नव वर्ष  हो  रहे हैं

 

राष्ट्र भांषा  हिन्दी  अब   वो  भी  खो रही है

वतन  की  आत्मा  भिंच  भिंच  के रो रही है

अभिव्यक्ति भाव भांषा  हिन्दी ही बोलती है

परीधी  में  वृत्त  की  हिन्दी क्यों  डोलती है

 

आदेश  हो   रहे   हैं   हिन्दी   में  काम  कर

साहित्य  का  तो  हो गया ये आखिरी सफर

मुर्दों  से  क्रान्ती   की   उम्मीद   कर  रहे हैं

कवि  लेखकों  को  देखेा  बे  मौत  मर रहे हैं

 

कर  में  कलम को कस लो जगा दो देश को

पाश्चात्य   संस्कृति  के  मिटा  दो  भेष को

बाहर  निकालो   धर्म से छिपे अखिलेश को

महर्षि    पार्णिनि    के  खोजो  अवशेष  को

 

चिन्गारियों   में  शब्द पतंगों  से जल रहे हैं

आदर्श  संस्कृति   के, भुजंगो  से  पल रहे हैं

आडम्बरों  के   भेष  में  ये  राष्ट्र  खो रहा है

कवि  आग  मृत  शवों  को,ये  देश ढो रहा है।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

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