#Kavita by Rajendra Bahuguna

जुगाड का विधान

इस संविधान के पन्नो से अब  कुडा  करकट दूर करो

इस आरक्षण और  संरक्षण  के  सपने चकनाचूर करो

जाति पांति के झगडों पर मिलकर हमला भी पूर करो

इस संसद में कुछ राष्ट्र हितों के निर्णय ऐसे क्रूर करो

 

नई बिमारियां  उठती  हैं क्यों  संविधान  की धारा से

फिर क्यों  होते  हैं  हल्ले-गूल्ले  राजनीति आवारा से

कानून बने है कुछ ऐसे  जो आपस  में  ही काट रहे हैं

संविधान   के पन्नो  से  हम  देश के टुकडे बांट रहे हैं

 

संरक्षण सबको मिलता है  अब सडे-गले इन पन्नो से

अब राजनीति रस चूस रही  है सूखे हुये इन गन्नो से

इन संविधान के पन्नो से बस,डाकू ही पनपते जाते हैं

इस संविधान की कसमो से यंहा भ्रष्ट  बचाये जाते हैं

 

उपर से गिरधर की  गीता न्यायालय  को झेल रही हेै

ये डाकू,चोर, उचक्को   की  औलादें इससे खेल रही है

छल,कपटी, झूठे  अधिवक्ता बहस  इसी पर करते हैं

कुछ बे-गुनाह  हमेशा संविधान के कानूनो से मरते हैं

 

राजनीति  के  अभियुक्तों  को  संरक्षण मिल जाता है

न्यायाधीश  भी बिकता है,निर्णय  भी हित में आता हेै

क्यों पनप रहीअहिसुष्णता इस संविधान की आडो में

क्यों लावारिस कानून  यंहा  पर लटक रहे  हैं झाडों में

 

प्रजातन्त्र  के  अधिनायक  पर  अंकुश कौन लगायेगा

जो लांघ रहे हैं मर्यादा को उन्हे  सीमा कौन दिखायेगा

क्या संविधान  के  कानूनो  से अहिसुष्ण रूक जायेगा

क्या संविधान भी उंचे पद की राष्ट्र भक्ति को गायेगा

 

क्या संविधान को राजनीति  के अधिनायक ही चाटेंगे

ये सम्प्रभुत्व  सम्पन्न  सियासी  सम्प्रभुता को बांटेंगे

अस्पृष्य अन्त की बाते हैं,फिर  भी  कोटा है गिनती में

संविधान  से  आरक्षण  की  भीख  मिली  है विनती में

 

क्यों दीनो में और  अमीरो में यहा भेद सदा  से होता है

अहिसुष्ण, अराजगता  को  क्यों  संविधान  ये ढोता है

जाति,मजहब  के  झगडों को अब कौन बनाने वाला है

क्यों येअन्द,गन्द,दुर्गन्द यंहा पर संविधान ने पाला है

 

यहां  न्यायाधीशों  की  पञ्चायत  चौराहों  पर  बोलेगी

सब राजनीति  के दांव-पेंच  जनता  के  आगे  खोलेगी

किस कदर लुटि है न्यायपालिक जनसेवक के हाथों से

क्यों न्यायालय  में जज बैठे  हैं मजबूर हुये अनाथों से

 

अब येे देश बिखरता जायेगा इस  संविधान के साये में

ये अखण्ड राष्ट्र  अब  घूमेगा, इस  राजनीति चौराहे में

इस जुगाड के संविधान में वो भारत  वाली बात नही है

कवि आग की कविता में परिवर्तन  की औकात नही है।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

989739981

 

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