#Kavita by Rajendra Bahuguna

न्याय में अन्याय

न्याय,न्याय से भीख न्याय की,न्यायालय में मांग रहा हैं

अब गले में  शूली  संविधान  की  धाराओं  की टांग रहा है

गीता की  गठडी  सिर  पर  है, सत्य-सत्य  चिंघाड़ रहा है

यहां दलित-भेष में न्याय खडा है,अपने कपड़े फाड़ रहा है

 

इन धाराओं  की  चाबुक लेकर,अधिवक्ता फटकार रहा है

यहां कानून शब्द के हथियारों से संविधान को मार रहा है

धर्मराज अधिवक्ता  बनकर, हर  मुजर्रिम को तार रहा है

फिर  भी  न्यायाधीस  देश  में  ईश्वर  का  अवतार रहा है

 

क्यों  राजनीति  के  हथकण्डों  में  न्याय फंसा कहराता हैं

न्यायालय में बलात्कार का मुजर्रिम क्यों इज्जत पाता है

व्यभिचारी  और  चोर, उचक्के,राष्ट्र-नियन्ता बन जाते हैं

क्यों  न्यायालय  में  भ्रष्टाचारी गीता  की  कसमें खाते हैं

 

यहां कानूनो से जज,अधिवक्ता,मुजर्रिम पीढी खेल रही है

न्याय  की  देवी  आंख  में  पट्टी बांधे सब कुछ झेल रही है

क्यों कानून  यहां  पर  बिकता  है दल्लों के हाथ चौराहे में

अब यहां न्याय पालिका खेल रही है,देख सियासी साये में

 

उन्नाव की  हत्या, बलात्कार, कानून की हरकत कहता है

क्यों  आसिफा का  खून यहां, इस  नृशंस नदी में बहता है

क्यों इस खौंप की दहशत को यहां कानून हमारा सहता है

न्याय का मन्दिर  भारत  में  क्यों  सहमा-सहमा रहता है

 

आधे से ज्यादा  मुजर्रिम  जिस संसद में चुनकर आते हों

अधिकारी, अधिवक्ता, जज  जहां  गीत उन्ही के गाते हों

फिर जहां धृतराष्ट्र की औलादें भी नैनसुखी बन जाती हों

जहां पढी लिखी  पीढी  भारत  की  गीत उन्ही के गाती हो

 

मैं ऐसी  न्याय  व्यवस्था  के  सिद्धान्त बदलना चाहता हूँ

मैं इस संविधान  की धारा के  दृष्टान्त बदलना चाहता हूँ

जज,अधिवक्ता और मुजर्रिम,  दुर्दान्त बदलना चाहता हूँ

मैं कवि आग हूँ,सत्ता के सब सम्भ्रान्त बदलना चाहता हूँ।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

9897399815

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