#Kavita by Rajendra Bahuguna

कर्नाटक में नाटक

मैं राज्यपाल  हूँ,दामोदर की  मुरली ही तो बजा रहा हूँ

मैं  गुजराती  माडल  ही  तो  कर्नाटक  में, सजा रहा हूँ

मैं कर्नाटक से मोदी  भाई, अमितशाह को भजा रहा हूँ

आर.एस.एस.का सेवक हूँ मैं कहने में कब लजा रहा हूँ

 

कर्नाटक ने उच्चाटक का  नाटक  फाटक खोल दिया है

राजनीति  में  सत्ता  पाने का  उदघाटक खोल दिया है

मैं  धृतराष्ट्र  हूँ  राज्यपाल  हूँ, एहसान चुकाने आया हूँ

फिर  बी.जे.पी.  का डी.एन. हूँ, मोदी  भाई  की काया हूँ

 

फिर मेरे रहते प्रतिपक्ष का बहुमत सिद्ध नही हो सकता

सत्ता में व्यभिचारी  भी  न्याय निषिद्ध नही हो सकता

यहां चाल,चरित्र  और चेहरे  डूबकी मार रहे हैं पोखर में

भविष्य देश का देख रहे है हम  सब सर्कस के जोकर में

 

पूरे देश  में  आज  विधायक  बिकने  को  तैयार खडा है

यहां देख  रहे हो राजनीति  में दुष्टो  का व्यापार धडा है

अब बडे-बडे सम्भ्रान्त बिकेंगे इस राजनीति के साये में

क्यों पी.एम ,सी.एम. खडे  हुये  हेै  राजनीति  चौराहे में

 

ये  वाणी-भूषण,  बुद्धि-बल्लभ  मर्यादा  सब भूल गये हैं

अब  कामी ,क्रोधी, लोभी सारे सत्ता मद  में फूल गये हैं

किस  मूँह  से ये राज  करेगे ये यहां कौन पूछने वाला है

फिर दामोदर  भाई ने ही  तो इन सब भक्तों को पाला है

 

क्यों राम-भक्त की  व्याकुलता  है  रावण वंश पटाने में

क्यों सभी निशाचर व्याकुल हेैं, प्रतिद्धन्दी दंश घटाने में

अमित शाह  भी  लगा  हुआ  है जनमत  अंश जुटाने में

यहां पी.एम.मोदी  भी तत्पर है  दुर्योधन,कंस मिटाने में

 

क्यों टी.वी.चैनल  पितामाह  की खुली वकालत करते हैं

क्यों यहां चौथे स्तम्भ  सियासत  का  ही  पानी भरते हैं

क्यों सेवक  और  सम्पादक सत्ता  का ही चारा  चरते हैं

क्यों चौबीस  घण्टे कष्ट  सियासत का ही चैनल हरते हैं

 

अब सविधान  भी  कर्नाटक का नाटक देख के हार गया

प्रजातन्त्र  से जनता, जनमत, बहुमत  का उपचार गया

यहा लाँघ के सीमा मर्यादा की  जन  सेवक उपकार गया

कवि आग  की  लपट गयी, जनमत  से इज्जतदार गया।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

9897399815

 

 

 

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