#Kavita by Rajendra Bahuguna

सही समय पर सही ढंग से रची गयी रचना है,लम्बी है,पर पढकर मजा आयेगा।

मॅंहगाई

पैट्रोल और डीजल भी हमको अब औकाते दिखलायेगा

रामभक्त पुष्पक विमान  से उड़कर दुनिया में जायेगा

सब सह-मात  का खेल सियासी राजनीति से ही खेलेंगे

इस रास लीला को डेढ़ अरब  के मुर्दे जनमत ही झेलेंगे

अपना पी.एम.उड़न  खटोले  में  ही  उड़ कर लहरायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में, यारों बडा  मजा  आयेगा

 

प्याज बढ़ा  सरकार  गिरी  थी ,अब  पैट्रोल  की बारी है

यहां डीजल  भी अब अपने ढंग से खेतों   का घरबारी है

मोटर,गाड़ी पडी सडेंगी,अब  साइकिल उभर के आयेगी

अब अच्छे दिन तो  डेढ़ अरब की भीड़ हमें दिखलायेगी

नेता  फिर  भी  भजन  सियासत  के ही सुर में  गायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में, यारों बडा  मजा  आयेगा

 

पहले  हम  खाना  खाते  थे, अब खाना हमको खायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में, यारों  बडा  मजा आयेगा

खाद्यान की कीमत  सुन कर,मध्य-वर्ग  ही शर्मायेगा

चीनी  की  कडवाहट  से  तो तीखा भी मन को भायेगा

अच्छे  दिन  आने  वालें  हैं  ये मजाक भी  कर जायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में,  यारों बडा  मजा आयेगा

 

यहां शब्जी आॅंखे अब फाड़ेगी ,जेबें भी सब की  ताड़ेगी

एक बार फिर दाल की कीमत  धरा में जिंदा ही गाढ़ेगी

आटा ,टाटा फिर बोलेगा,यहां मैदा भी सब  को तोलेगा

यहां घी ,तेल की मजबूरी  है अब चर्बी खुलकर घोलेगा

भोंजन  में  शूगर  सुनकर  के,थोडा धीरज बॅंध जायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में,  यारों बडा  मजा आयेगा

 

आलू, मटर,  टमाटर, अदरक  हमें देखकर चिल्लायेंगे

धनिया,प्याज लहसुन नर भक्षी जिन्दा  हमको खायेंगे

गोभी, बेंगन ,लौकी, तोरी,भिन्डी, टिन्डा और चचिन्डा

हमको भी एेसे काटेगी जैसे महिसासुर को,माॅं चामुन्डा

अब मध्य -वर्ग भूखा सोयेगा,धन वाला दावत खायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में, यारों  बडा  मजा आयेगा

 

राजनीति,अब फेल हो गयी ,सारी जनता खेल हो गयी

यहां घुॅंस पेंठिये  घुसे जा रहे,बुलैट-ट्रेन की रेल हो गयी

संंसद  की  कैंटिन  है  सस्ती , नेता के घर पल जाते हैं

अब मॅंहगाई   का  कारण  पूछो ,सारे नेता टल जाते हैं

यंहा लोकसभा में देखो जोकर जोर जोर से चिल्लायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम   में, यारों  बडा मजा आयेगा

 

सरकारी  ऋण  चाहने वाला सौ-सौ चक्कर काट रहा है

धनपतियों  के घर-घर जाकर बैंक लोन को बाॅंट रहा है

बैंकों  का  धन  नीरव, मोदी, माल्या लेकर भाग रहा है

चौकीदारी  करने  वाला  परदेश में   जाकर जाग रहा है

रिजर्व-बैंक तो  नौ  के दस को करने वाला बन जायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में,  यारों बडा मजा  आयेगा

 

वित्त व्यवस्था डोलरही है क्या इसपर चिन्तन होता है

कृषि प्रधान ये वसुन्धरा है,अन्न कहाॅं पर क्यों खोता है

भाव- भंगिमा  नेताओं  की  व्यापारी  को दिख जाती है

प्रजातन्त्र  की शेयर-बाजारों से  किस्मत लिख जाती है

लोकतन्त्र  के  इस कीचढ में भ्रम का भारत भरमायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम   में,  यारों  बडा मजा आयेगा

 

जीएसटी से नोट  बन्दी से टैक्स कफन पर लगजाता है

ये चौथा  स्तम्भ  राष्ट्र का अब बिका हुआ है शर्माता है

पूरा  शासन  अच्छे  दिन  को  अब कच्छों में ढूंढ रहा है

क्यों अब अरूण जेतली,तलवारों से नंगे भूखे मूंड रहा है

अब कोई तो पूछे वित्तमंन्त्री इस भारत से क्या चाहेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम   में, यारों  बडा  मजा आयेगा

 

जनसंख्या  को   डेढ  अरब  से  उपर हम ही  बढा रहे हैं

मॅंहगाई  का  भूत  स्वयं   के  उपर   हम ही  चढा रहे हैं

जनसंख्या और  मॅंहगाई  से  अर्थ व्यवस्था डोल रही है

प्रजातन्त्र  के  इस  नाटक  की  सारी  पोलें खोल रही है

आत्मदाह  का  सबसे सस्ता  ये  कारण हमको भायेगा

मॅंहगाई  के  इस  आलम  में,  यारों  बडा  मजा आयेगा

 

डीजल पैट्रोल भी सस्ता है,फिर भी क्यों हालत खस्ता है

अच्छे  दिन अब ,कब  आयेंगे,जल्दी ढूंढो कंहा  रस्ता है

इस मध्य-वर्ग, नंगे-भूखे  की, अब  केवल रोटी आशा है

काला धन और जी.एस.टी.ही बोट-बैंक की अभिलाशा है

कवि आग  तो  नेताओं   की, औकातों  को  दिखलायेगा

मॅंहगाई  के  इस   आलम   में, यारों  बडा  मजा आयेगा !!

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

मो09897399815

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