#Kavita by Rajendra Bahuguna

स्वाभिमान  हम छोडं चुके है

इस महबूबा मुफ्ती  को देखो,मुँह पर जूता मार रही है

राजनीति का मुल्य देख लो कितनी इज्जतदार रही है

ये  मजा  ले रही  भारत मां का,दृष्टि सीमा पार रही है

क्या छप्पन  इंची सीने वाली भारत की सरकार रही है

 

आतंकवाद  से  रमजानो   में  भी  समझौते हो जाते हेैं

ये भाव-हीन  बन्जर  धरती है फिर भी पौधे हो जाते हैं

भारत में गन्ना सड़ता है पाक से चीनी सौदे हो जाते हैं

चप्पे-चप्पे  पर  सैना हेै ,फिर बंकर  क्यो खोदे जाते हैं

 

लगता है दुनिया के आगे स्वाभिमान हम  छोड़ चुके हैं

पाकिस्तान के और  चीन  के  आगे  घुटने मोड़ चुके हैं

इस जनता की आशा तृष्णा के सारे  सपने तोड़ चुके हैं

अपने ही  हाथों  से  अपनी  भ्रम  की हण्डी फोड़ चुके हैं

 

पच्चीस करोड के पाकिस्तानी,डेढअरब पर भोैंक रहे है

यहां नेता सब चैनल पर  बैठे दाल सियासी छौंक रहे है

सेवा  से  निवृत्त  हुये  कुछ  फौजी भी दावे ठोक रहे हैं

महाभारत  को  सुनने वाले  भक्त  देखकर चौंक रहे हैं

 

कितने फौजी निपट रहे है  सत्ता  को कुछ होश नही है

चार साल पहले के भाषण  वाला अब कही जोश नही है

कौम,कबीलों के झगड़े  है ,राष्ट-भक्ति आक्रोश नही है

प्रजातन्त्र सत्ता का मद है,जनता  का कुछ दोष नही है

 

कुछ ना कुछ तो कारण है,जो मुफ्ती पर इतने मरते हो

कुछ तो है इस  महबूबा में है जो  इससे  इतना डरते हो

वो दिल्ली आकर  अपनी  सारी बातें तुमसे मनवाती है

कितने  फौजी  मर  जाते  हैं तुमको  शर्म नही आती है

 

यहां कौन तुम्हे अब रोक रहा है सरहद के बलिदानो से

कितना  और  नुकसान  करोगे  इन मुर्दो के तूफानो से

कितने ध्वज के कफन बनेगे बेमतलब मरती जानो से

यदि अब चर्चा  ही करनी  है,करके देखो वीर जवानो से

 

मैं अपनी हर कविता में तुमको  बे-घर दीन  दिखाता हूँ

मै छन्दो मे  आग लगाकर  राष्ट-भक्ति को ही गाता हू

मै भारत के कु्द्ध हृदय की अग्नि शिखा को सुलगाता हू

मै कविआग हू ज्वालामुख से शोलों की कविता गाता हू।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग

मो09897399815

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