#Kavita by Rajendra Bahuguna

भारत की भव्यता

हम को तो  अपनो  से  खतरा भूल रहे जो अपनों को

संजोये  थे जो  सपने ,अब   ढूॅंढ  रहे  उन  सपनो को

अब अंग्रेजी हो या  उर्दू  हो डरने  की  कोई  बात नही

कोई  हमको  डिगा  सके  अब ऐसी  भी औकात नही

 

सत् पथ से रथ भ्रमित हुआ उस पर  चिन्तन होना है

अगर  समय  से  नही   चेते, आगे  रोना  ही  रोना है

याद करो संस्कारों को जो अब तक जग में डिगा नही

हम उस  देश के वाशी  हैं जो कमजोरी  में बिका नही

 

हमने अकबर से औरंगजेब तक आतंकों  को  झेला है

इतिहास गवाह है इस धरती ने महाभारत भी खेला है

धर्मस्थल और ज्ञान ध्यान के देव  शिवालय को तोडा

हम आर्यखण्ड के वाशी थे ,हमने  संस्कार  नहीं छोडा

 

ब्रह्मा, विष्णू, शिव , लम्बोदर  क्यों धरती में आतें है

कुछ  बात है मेरी धरती  में, इतिहास हमें  बतलातें है

अनुसुइया,सीता,सावित्री  यहां  पति धर्म  बतलाती है

महाभारत  की पांञ्चाली  भी  धर्म युद्ध  सिखलाती है

 

स्वाभिमान की लक्ष्मी,पुतली,रण में  प्राण  गंवाती है

यंहा राधा ,मीरा भक्त,प्रेम में गीत कृष्ण  के गाती है

संकट में  अबला,रणचण्डी, विकट भयंकर  बन जाये

नर-मुण्ड कण्ठ  में  महिसासुर,रक्तबीज के लटकाये

 

मुगल और  अंग्रजों की ,पीडा  को हमने सहन  किया

कृपा है अलकनिरंजन,की हर बार,सबर का घूॅंट पिया

ये चेतन  और अचेतन को  धर्मो  से  धारण  करती है

आध्यात्म की वशुन्धराआज,अपने बच्चों से मरती है

 

विश्वास  सभी पर कर लेना,बश ये संस्कार हमारा है

यंहा धर्म  सनातन  श्रद्धा  है, ये आविष्काऱ  हमारा है

आध्यात्म् शीर्ष अतरंग चेतना,का पुरूष्कार हमारा है

राम ,कृष्ण, महावीर, बुद्ध में  भी   अवतार  हमारा है

 

धर्म सनातन  की  गंगा, हर  मजहब  सदा खपाती है

बस, मानवता  उत्कृष्ट  बने,ये गीत  सदा से गाती है

अपने  बच्चे भटक रहे,पथ,धर्म, मजहब  के भावों से

आज  सनातन  पीडित  है, अपने ही  तन के घावों से

 

ना जाने कितनी गन्द,सनातन गंगा अब भी ढोती हेै

इन नालों और पतनालों से  क्याें गंगा  मैली  होती हेै

र्दुभाग्य  हमारा अपना  है  जो मां,बापों  को भूल गये

वेद- शास्त्र  के अनुयायी, माया की  फांसी  झूल गये

 

धर्म की व्याख्या करते हैं जिनको धर्मो का ज्ञान नही

खण्डहर को ही ढोते हैं,जिसमें अल्लाह नही राम नही

लगता है  अब  इस  धरती में धर्म गुरू का काम नही

हृदय  में  बशने  वालों  का दुनिया में कोई धाम नही

 

वशुधैव-कुटुम्बकम् की  भांषा  वेद-शास्त्र अपनाते हैं

कल्याण जगत की परिभांषा हम धर्मों  में दोहराते हैं

मजहब,कौम, कबीलों  के झगडों से अब दिल रोता है

आज सनातन धरती में क्यों  हिन्दू,मुस्लिम होता है

 

आदर्श  मिले उपदेश मिले  कुछ  एसे छन्द सुनाउंगा

छन्दों  में  भी  धर्म सनातन  का वैभव  दिख लाउॅंगा

भारत  मां  की  लुटि  अस्मिता , पुनः धरा में लाउॅंगा

मैं कवि आग हूॅं‘सिंह’राष्ट्र का,घास कभी नहीं खाउॅंगा ।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

मो0 9897399815

 

 

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