#Kavita by Rajendra Bahuguna

आध्यात्म का व्यवसाय

हेरा-फेरी के  बिन  बाबा इस  धरती  में धनवान नही है

याेगी का व्यवसायी  होना  योग-शास्त्र पहचान नही है

पातञ्जलि  की  हाट  लगाना ये  भी  गौरवगान नही है

ये कटु सत्य है रामदेव और बालकृष्ण अनजान नही है

 

जो कुछ भी तुम बेच रहे हो किसी धर्म में कहां लिखा है

शास्त्रो का प्रमाण  दिखाओ योगी जग में कहां बिका है

योगशास्त्र को खोल के देखो उसमे धन्धा कहां दिखा हेै

इस लाल गेरूवे  में भी धन्धा तुमने बाबा कहां सिखा है

 

हर विज्ञापन में शक्ल दिखाना बाबाओ को  ही भाता है

फिर हर चैनल  में खर्चा करना कहां से ये पैसा आता है

इस धन्धे से पातञ्जलि के योगशास्त्र का क्या नाता है

सरकारों  को  रामदेव  और  बालकृष्ण ही क्यों भाता है

 

ये चौथा  स्तम्भ  मीडिया  अन्दर  जाकर छान करे ना

कहां से देशी घी आता  है  इसकी  कुछ पहचान करे ना

पहली घानी  का  सरसो  का  तेल  कहां से टपक रहा है

फिर कैसे  बाबा उद्योगो से व्यवसायो को लपक रहा है

 

यहां भारत  माँ की लाखो  एकड़ भूमि बाबा दबा चुका है

योग-शास्त्र को  आयुर्वेद  को  बाबा कबका चबा चुका है

बाल कुष्ण उद्योग  जगत  की प्रतिष्प्रधा में दौड़ रहा हेै

पातञ्जलि  के  अस्ति-पञ्जर  ये  बाबा  निचोड़  रहा है

 

भगवानो  के  नाम  से  धन्धा  केवल हिन्दू ही करता हेै

यहां वाटिका  परमेश्वर की  कालनेमि  ही क्यों चरता हैे

माया की दुनिया का बाबा  आध्यात्म कलुषित करता है

कवि आग आध्यात्म जगत भी अब तो बाबा से डरता है।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

9897399815

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