#Kavita by Rajendra Bahuguna

योगासन दो शब्दों का जोड़ है,योग और आसन, योग आन्तरिक चेतना का विषय है और आसन शारीरिक रूग्णताओं को व्यवस्थित करने का, परन्तु हमारे तथाकथित योगियों ने योग के नाम से आसन का इतना प्रचार-प्रसार कर दिया कि हम योग उस परम व्यवस्था को ही भूल गये और आसन को ही योग समझ बैठे,य़ह हमारे आध्यात्म विज्ञान की इतनी बड़ी क्षति है जिसकी शायद हम भविष्य में क्षति-पूर्ति ना कर पायें।इसके लिये वे सभी बड़े-बड़े अज्ञानी लोग जिम्मेदार हैं जो योग के नाम से आसनो का व्यवसाय कर रहे हैं।
य़ोग और आसन का उपयोग
आनन्द विभोर हो करके मैने जब मोदी का आसन देखा
पौराणिक विस्मृतियाँ जागी जिसकी अब तक दबी थी रेखा
इस आदिकाल की परम्परा को घर-घर में पहुंचना होगा
नई पीढी कुछ स्वस्थ बने बस, यही राष्ट्र का गाना होगा

हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई एक बने बस, यही कला हेै
सम्प्रभुत्व हो राष्ट्र हमारा, सब कौमो का तभी भला है
यहां सभी रोग की एक दवा है, व्यायामो के आयामो की
अभ्यासों से लक्षित होगी, मानव मंजिल अन्जामो की

तन, मन सुन्दर बन जाये तो हरा भरा मरूधान बनेगा
राम कुष्ण महावीर, बुद्ध का फिर से हिन्दुस्तान बनेगा
सूभाष,भगत, शेखर, बिसमिल्लाह,फिर से धरती में आयेंगे
सारी कौमे राष्ट्र – भक्ति के गीत, प्रीत मिल कर गायेंगे

बस योग,योग हो,राजनीति से विद्दया कलुषित ना हो पाये
हो निर्विकार, निशुल्क प्रेरणा, मानव,मानव तक पंहुचाये
स्कूल मदरसों, संस्थानो में, नियमित सब अभ्यास करें
यहां ये मिसाल बन जाये भारत, बस भारत की आस करे

आसन, प्रत्याहार, नियम सब जीवन की ही मात्र कला है
बस,ध्यान, धारणा और समाधी से ही केवल योग फला है
इन व्यायामो की इस सीमा में योग शास्त्र को अब ना बांधो
उस परं तत्व को लक्ष्य बनाकर,आयामों से योग को साधो

अब रूग्ण शरीरो से मुक्ति हो दुनियाँ फिर से ऐक बने
ये वैमनस्यता रगडे – झगडे हटे, जगत बस, नेक बने
पातञ्जलि की इस विद्या का मुल्य प्रेम है बंटता जाये
कवि आग इस धर्म धरा में, योग – धर्म को रचता जाये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
मो0 9897399815

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