#Kavita by Rajendra Bahuguna

कल कबीरदास जी का जन्म था,कुछ मूर्ख उनके विषय में अनर्गल टिप्पणीयां कर रहे थे इसलिये यह रचना लिखी गयी।

वेद-भेद बतलात है,जग वेदन के माही
हम वेदन के पार है,ये वेदन जाना नाही

हद टपे सो ओलिया, बेहद टपे सो पीर
हद-बेहद दोनो टपे,ता को नाम फकीर

हम वाशी उस देश के जहां पारब्रह्म का खेल
दीपक दिया अगम का बिन बाती बिन तेल
अभेद के भेद का खेद
अब तो मोदी जी भी कबीरा की रूहानी गा रहे हैं
नर्क था मगहर कभी अब स्वर्ग सा अपना रहे हेैं
अब देख लो दस्यु भी दरवेशो के दर पर जा रहे हेैं
यहां ये मौलवी,पण्डे कबीरा को हमें समझा रहे है

ले मँडासा हाथ में जो हिन्दू ,मुस्लिम काटता था
इन रूढियों को दफन कर चौराहे में जो पाटता था
दरबारियों के ज्ञान की चटनी बनाकर चाटता था
आत्मदर्शन की किरण चिन्गारियो से बांटता था

उन फकीरों के हुनर से हम आज तक अनजान है
ब्रह्माण्ड मे भी जिस तूर की जगमगाती शान है
इन औलिया पीरों में जिसका आज भी सम्मान है
यहां आज हिन्दुस्तान की उस शख्स से पहचान है

हम उस कबीरा की मजारों में सियासत खेलते है
इन जनमतो की भीड़ को भी सल्तनत में ठेलते है
हम जानते कुछ भी नही है शब्द फिर भी पेलते है
ये राम,अल्लाह,कृष्ण,मीरा भी सियासत झेलते हैं

हे सियासी रहनुमाओ अब बख्स दो इस देश को
बस,इस राजनीति से बचाओ औलिया दरवेश को
यदि हो सके तो काट दो आडम्बरी इस भेष को
खण्डहरों में मत धकेलो ब्रहमाण्ड के अवधेश को

मैंने कबीरा को पढ़ा है, इसिलिये अकुला रहा हूँ
मै विवश हूँ, मुर्खता के इस भेद को बतला रहा हूँ
मैं विनती करता हूँ, सियासत धर्म को अब छोड़ दे
कवि आग इन चिन्गारियो को ना नया कुछ मोड दे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

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