#Kavita by Rajendra Bahuguna

वर्तमान न्याय पालिका और कार्य पालिका पर यह रचना सटीक बैठती है।

नेता और कानून

न्याय पालिका,कार्य पालिका में भी अब संग्राम मचेगा

इन मेरे देश  का नेताओं  से  कंहा-कंहा कोहराम रचेगा

माल,  मशालेदार  फैसले   सब  संसद  में  ही  निपटेंगे

ये सब टुच्चे-मुच्चे सारे झगड़े कोर्ट,कचहरी में चिपटेंगे

 

न्यायालय  में  संविधान  के पन्ने सब नीलाम  हो गये

कानूनो  की  इस  मण्डी में अधिवक्ता ही आम हो गये

जज, मुजरिम, बैरिस्टर  सारे बिकने को  तैयार  खड़े हैं

नीचे  से  उपर  तक  सबके  अपने – अपने  तार  जुड़े हैं

 

क्यों सारे नेता अधिवक्ता है,अधिवक्ता ही नेता होते हेै

प्रजातन्त्र  को  संविधान  के जीर्ण – सीर्ण  पन्ने ढोते है

न्यायाधीश  भी  बदल  रहे  हैं,  राजनीति के दरबारों से

संसद  की  नौका  नतमस्तक  कांप  रही है  पतवारों से

 

यहां भारत भाग्य विधाता  सारे डाकू  बीहड़  बना  रहे हैं

संसद   के  मन्दिर  में  अपनी  ईद, दीवाली, मना रहे हैं

दोनाे  सदनो  के  सर्कस  में  जोकर  नाटक  खेल  रहे हैं

हम डेढ़ अरब के तमास-बीन है बोट-बैंक को, झेल रहे हैं

 

क्यों  नीरव,मोदी,माल्या  भागे  इन  कानूनो के साये में

यहां भूमिधर  मरता  है  ऋण  के खातिर क्यों चौराहे में

फिर नब्बे प्रतिशत  मुजर्रिम  नेता संसद में चिल्लाते हैं

इस संविधान की कृपा है,सब जनमत से चुनकर आते हैं

 

कुछ टूटे – फूटे राज्यपाल अपशिष्ठ,सियासत से आते हेैं

छल-बल-कपटी अनुभव के,ये भजन सियासी ही गाते हेै

फिर  लग जाती  है आग यंहा पर प्रजातन्त्र गलियारों में

क्यों जीर्ण-शीर्ण से धृतराष्ट्र भी पलते हैं इन सरकारो में

 

कानून जंहा पर अन्धा हो,वहा न्याय-पक्ष की आस नही

न्याय जंहा पर बिकता  हो,वो न्यायालय का न्यास नही

चरित्र हीन को  चरित्रवान  सम्मान न्याय से मिलता हो

जहा राष्ट्र-द्रोह के  कारण ही सत्ता से राष्ट्र संभलता हो

 

संसद में बहुमत को पाओ,फिर मन चाहा कानून बनालो

कार्य पालिका निर्णय-सिन्धु है,चाहे जो भी काम करालो

न्यायाधीश  भी  उँचे पद  की विषय-वाशना झांक रहा है

ये राजनीति के सभी फैसलों के मुल्याकन से आंक रहे है

 

यहां सब सी.बी.आई के तोते सत्ता के पिञ्जरे में रहते है

फिर जो-जो  सत्ता  रटवाती  है, ये तोते भी वही कहते है

आजादी  के  बाद  देश  में हम  यही सर्कस तो देख रहे हैं

तभी तो सारे,उद्धोग-पति और  व्यभिचारी सब नेक रहे हैं

 

अब कानून जंहा पर कानूनो  को, कानूनो से  ही  काटेगा

न्याय जंहा पर जनमत  से,जन-जन  का जनमत बांटेगा

जहा  संविधान  के पन्नोे  से सम्भ्रान्त निकम्मे पलते हैं

कवि  आग   कानून  वंहा, शव, लाश ,कफन  से जलते हेैं।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

9897399815

 

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