#Kavita by Rajendra Bahuguna

 

धरती की वेदना

बर्षात में मेरे खेत  की  मिट्टी कटी और बह गयी

बहते-बहते बे-जुबां ना जाने क्या-क्या कह गयी

बेजान होकर भी युगों से, इस धरा को जोड़ती हॅूं

अंकुरों की आश में  बीजों  को नित में फोड़ती हॅूं

अस्मिता  लुटती  गयी  दुनिया परायी कह गयी

बर्षात में मेंरे खेत  की  मिट्टी कटी और बह गयी

 

पालती  हूॅं   मैं   जकड़ कर  जंगलों  को  मूल से

यंहा हर्ष है  संघंर्ष  है  कंही  फूल  से कंही शूल से

मैं  दरख्तों  से  दबी  हॅूं बस, आबोदाने  के  लिये

मैं कष्ट  में  भी  मौन  हॅूं सम्मान  पाने के लिये

साथ मेरा  जल, पवन  का बह गया, मैं रह गयी

बर्षात में  मेरे  खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

 

भेद सरहद  का  कभी  ना  आज तक मैंने किया

हर रोंदने वालों  को  भी  मैंने  हमेशा  सुख दिया

मैं बेजुबाॅं बेजान बन कर भी  जहाॅं  को पालती हूं

हर हाल में दुनिया बचे, खुद को रही मैं ढालती हूं

परवरिश  करती  रही  दुनिया  परायी  कह  गयी

बर्षात  में  मेरे  खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

 

बनती गयी  तरुणा  कंही,करुणा कंही,हर हाल में

मैं  मुस्कुराती  ही  रही  भूचाल  की  हर  चाल में

मौसमों  की मैं नियन्ता इस श्रृष्टि में बनती रही

हरियालियाॅं  हर हाल में,मैं नित नयी जनती रही

सब कुछ लुटा बंञ्जर बनी,बेजान बनकर रहगयी

बर्षात  में  मेरे  खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

 

क्यों बढ़ती  रही  आबादिंयां,बर्बादियों के नाम से

अब कौन  डरता  है  यंहा  पर कुदरती  पैगाम से

कट गये  मेरे केश तरू थे,मातम मनाने के लिये

मरूद्धान, मरूस्थल  बने ,विधवा बनाने  के लिये

लुटता  रहा  सौन्दर्य  मेरा, घाव  केवल गह गयी

बर्षात में मेरे  खेत  की  मिट्टी कटी और बह गयी

 

मैं  आज  भी  तैय़्यार  हॅूं  सर्वस्व  खोने  के लिये

रब  ने  बख्शा  है  हुनर , हंसती  हॅॅू  रोने के लिये

अपना यंहा कुछ भी नही निर्जीव मिट्टी बोलती है

मौन हो कर ये धरा औखात  सब  की  खोलती है

मैं बे-जुबाॅं, बे-जान सी , बेटी बनी  सब  सह गयी

बर्षात  में  मेरे  खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

 

क्यों सरहदें  बनती  हैं  मेरी  छातियों को काटकर

क्यों धर्म ,मजहब  बन  रहे  हैं लाश मेरी बांट कर

क्यों राष्ट्र  के नामाें से अब पहचान मेरी हो रही है

क्यों  हे  विधाता  आज  तेरी  रत्नगर्भा  खो रही है

मैं आग  की  चिन्गारिंयों में शब्द बनकर रह गयी

बर्षात  में  मेरे  खेत  की  मिट्टी कटी और बह गयी ।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )

मो0 9897399815

 

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