#Kavita by Rajendra Bahuguna

कुदरत की आवाज

जब  वर्षातों में  सारी  नदियाॅं ,बडे़  वेग  से  बहती हैं

इन  तूफानों  के  उफानो  को  वशुन्धरा  ही सहती है

उजड़  गया  है  चमन, प्रकृति  मौन सदा से रहती है

परिभांषा में, भूकम्पों  की ,धरती  सब कुछ कहती हैे

 

सूखी नदियाॅं,बंजर धरती,अभी से मातम मना रही हैं

ये विकाश की परिभांषा विध्वंस पथों  को बना रही है

नियम ऋतु के बदल रहें हैंआकालों की अभिलाशा में

मूरख  मानवता  जीती  है, आशा  तृष्णा की भांषा में

 

जंगल काटो, पानी  बाॅंटो, अव्वल दोयम धरती छाॅंटो

खनिजों के शोषण से,धरती माता की छाती को चाटो

क्यों अब प्रहरी के प्रहारों से सोन्दर्य धरा का खोता है

ये मौसम  भी  तो  धरती  की  मुर्दा लाशों को ढोता है

 

अब  कंहा  गयी  वो शर्दी,गर्मी, बर्षातों की फुहर छटा

अब कंहा गयी  वो  मेघों के ,गर्जाने वाली श्याम घटा

तितली,चिडियाँ कंहा गयी ,कंहा  गयी वो सुमन लटा

वो  बसन्त  भी कंहा गया,द्रुम की  डालों का पीत पटा

 

क्षत, विक्षत मानवता के शव,मृत शैय्या पर लेट गये

आकाल,प्रलय  प्रलापों से,बे-समय  मौत की भेंट गये

इस कुदरत  के  संवेदन  में, ये  दीन दशा जब होती है

तब भूत, पिचासों  के  मानव को धरती माता ढोती हैे

 

ये सूनामी,ये हुद-हुद है,कंही प्रलय प्रताप प्रकट खुद है

देख  नजारा  कुदरत  का, ये संकट  भी  तो अदभुत है

क्यों नंगे – भूखे ही मरते हैं,कुदरत की कर्कस आहों से

परिवर्तित  होता  है  मौसम ,मानव  के  मरे गुनाहों से

 

गाद बिछी  है नदियों  में, तल जल  का ऊपर जाता है

जलबोर्ड  संरक्षण का विभाग भारत में बैठ के खाता है

सरकार नदी  के हर तट पर तट बन्ध बनाती जाती है

ना समझी  की  हर  हरकत  ही शहर गांव को खाती है

 

पानी की  निकासी  के  नाले, हमने घेरे और पाट दिये

शहरों  की  सडकों  के  पथ भी,प्रतिष्प्रधा में चाट दिये

वर्षात  में  नांवे  चलती  है,गली ,कूचों और बाजारों में

शहरों  की  इज्जत  लुटती  है चोरों  में और चकारों में

 

अस्तित्व  बचाना है अपना, संसाधन में घटतोल करो

जंगल  और  जमीनों  में, ना  कुदरत से कल्लोल करो

श्रृंगार करो  फिर से माॅं का  अस्तित्व धरा में लाने को

मैं तो आग  लगाने बैठा  हूॅं ,चिन्गारी  से समझाने को ।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

मो0 9897399815

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.