#Kavita by Rajesh Gupta Badal

लो उठा लो कलम को तोड़ भी दो दीवार को।
उद्घोश कुछ नया ही तुम यूं लगाईये।।

घायल पड़ी रूह को सिसक रही स्वांस को।
मरहम आज सच का आप लगाईये।।

तुमने घना रो लिया मर मर के जी लिया।
वक्त की है पुकार ये उन्हें भी रुलाईये।।

चीख गूंजती आज भी यादें शेष हैं पाप की।
मीटू सही अहसास तो उन्हे कराईये।।

राजेश गुप्ता’बादल’
मुरैना म.प्र.

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