#Kavita by Rajesh Gupta Badal

चुनाव में आदमी——

बहुत बो लिए जो बीज बिषैले
फितरतों से है मज़बूर आदमी,
चमन ये यूं ही नहीं कांट कंटीला
गुनहगार तू ही है मगरूर आदमी।

यूं भी आसान ही तो है यूं
उठा के उंगली किसी से सबाल पूछ्ना,
नया नहीं हुनर ये भी है बहुत पुराना
उछाल कर कीचड़ होता है मशहूर आदमी।

देखो उड़ा कर धूल सूरज को भी
वो जुगनू मोहताज ही समझता है,
उड़ेल रहा अपनी जड़ों में छाछ जो
है वो किस कदर नशें में चूर आदमी।

किस कदर लपलपाने लगी हैं जीव्हा
और कितनों की है टपटपाने लगी लार,
ये चुनावों का दौर है साहब
हराम के नमक का भी फ़र्ज़ तो
निभाता है भरपूर आदमी।

जिसने आसमान से रार ली है,
यूं समझो मौत तो खुद को खुद की दान दी है,
उसको भी झुनझुनों का डर दिखा पायेगा
यदि सोचता है तो बस सोच पायेगा खजूर आदमी।

बोलता है सूप बहुत सुना था हमने
आजकल बोलने लगीं हैं बत्तीस छेद की चालनी।,
कुछ तो होते हैं जो काजल की कोठरी में भी
खिलते हैं वहां भी अनवर से लगातार ले नूर आदमी।

और फिर सियासतों की बात कैसे करूं बादल
हैं काठ के उल्लू और बे सिर पैर की बातें,
हुनरमंदों की भी तो सोच देखो, लंगड़ाती हो कुर्सी
सारी सांठगांठ हो इनकी और मरता रहे मजदूर आदमी।

राजेश गुप्ता’बादल’
मुरैना मध्यप्रदेश

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