#Kavita by Rajesh gupta badal

एक मुक्तक दो छंद
जो बांह मरोड़ सकें गुनाहों पर हमारे,
जिंदगी में कुछ लोग ऐसे होना चाहिए।
देख कर जिनको ये मन नमन करें,
हमसफर ऐसे भी तो मिलना चाहिए।
प्रेम भरी भाषा जब समझ ना आती हो,
ममता को भी कभी तो रोद्र होना चाहिए।
पल पल बढ़ रही हो जो अंधेरों की छाया,
तो गुरु कोई जानकार मिलना चाहिए।

फजीहतों से जो बचना हो उसे आजकल,
कांव कांव के बीच चुप रहना चाहिए।
चुभने लगी हैं करतूतें सफेद पोश की ,
आज फिर आजाद कोई होना चाहिए।
बहुत बिक रहीं है कलम जो रोज रोज,
कलम की धार का आभास होना चाहिए।
सभी खट रहे जो खुद के ही स्वार्थ पर,
चाल पल देश के भी नाम होना चाहिए।

राजेश गुप्ता’बादल’
मुरैना मध्यप्रदेश

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