# Kavita by Rajesh Gupta Badal

_किरदार_

जो तू मिला क्यूं तू मिला ,
मिलकर फिर क्यूं
बिछड़ गया,
अक्श ताजा है अभी
वो मोहब्बत बाला,
दुविधा में है ज़हन
देख तेरा ये चहरा
नित नये किरदारों बाला।
तुझमें रव देखा था
खोया था आठों पहर तुझमें ही
तू तो उम्दा फनकार निकला
ले जो किरदार मक्कारों बाला।
मैं प्यासा था प्यासा ही रहा
तेरी उन प्यार भरी दो बातों का,
ये तन्हाईयां कर हिस्से मेरे
तू बना है परवाना
उन महफ़िलों में उजयाली रातों बाला।
दगा मिला हरदम दगा मिला
लोकतंत्र में हर कोई
ले कई किरदार मिला।
ग़म में डूबा है जन गण मन
नायक फिर भी हर कोई
देखो मदमस्त मालामाल मिला।
पहचानों इन चहरों को
ऐसी भी कोई तदबीर मिले,
जब जब खींचा एक मुखोटा
हैरान हूं कि हर बार
इक नया नक़ाब मिला।
इंसानओं में भी देखो
पल पल बदलता रंग
गिरगिट सा वो
सियासतदान मिला।
जगा रही कलम
सोई हुई अवाम को
कब तक भागोगे तुम
पागलों की तरह
पीछे इनके
ये बरगलाते रहेंगे
दे दे नारे
यूं मज़हब और जात पात के ।
सिसक रहीं हैं बहुत
मोहब्बतें आजकल
भर सको तो भर लो
आगोश में उन्हें भी।
वक्त है अभी सहेज लो
अमन ओ चैन को,
वरना तोड़ने में देर कहां
लगती है इन्हे आपसी प्रेम को।
सोचलो साल ये फिर से
मनहूसियत लायेगा,
भाई से भाई को
चौराहे पर लड़ायेगा।
कुछ किरदार दिखेंगे
अपने से जरूर यहां
मगर सत्ता की चाबी के बाद
तुमको इनका एक बार फिर
नया ही किरदार नजर आयेगा।

राजेश गुप्ता’बादल’

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