#Kavita by Rajesh Kumar Singh

आज़ादी और हम

 

 

इन्द्रियों के ग़ुलाम हैं,आज़ाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

मुज़फ़्फ़रपुर का बालिकागृह दुत्कार रहा है।

हमारी नपुंसकता को वह धिक्कार रहा है।।

 

धरती के लिए बोझ हैं,औलाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

नये दौर में हमसब आदिमानव दिखते हैं।

शोहरत के नाम पर दो कौड़ी में बिकते हैं।।

 

स्वामी-सुभाष जी जैसे फ़ौलाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

सीधापन मूर्खता है,धूर्तता ही अब बुद्धिमानी है।

ग़रीब आँसू सस्ते हैं,अमीर छींक भी कहानी है।।

 

देश के लिए दीमक हैं,बुनियाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

मतलब है तो रिश्ता है,मतलब नहीं तो रिश्ता नहीं।

चापलूसों का संसार है,दिल में कोई बसता नहीं।।

 

विलासी कठपुतली हैं,शहज़ाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।

भारतमाँ की संतान ही माँ को देते ग़म हैं।

स्वदेश की जगह स्वार्थ के लिए जीते हम हैं।।

 

आस्तीन के साँप हैं,फ़रियाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

सूचनातंत्र में बने रहने के लिए कुछ करते हैं।

आत्मा और परमात्मा की नज़रों में गिरते हैं।।

 

धर्म और संस्कृति बिल्कुल याद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

इन्द्रियों के ग़ुलाम हैं,आज़ाद नहीं हैं।

विचारों से दरिद्र हैं हम,आबाद नहीं हैं।।

 

नारीशक्ति जब भी जगी हैं; असुरों का संहार हुआ है।

दुर्गा,काली या लक्ष्मीबाई; हर रूप में सत्कार हुआ है।।

 

:-राजेश

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.