#Kavita by Rajesh Kumar Singh

सनातन भाई-बहन 🌍👫

 

 

तू सदियों से मुझे छेड़ रहा; मैं भी तुम्हें अब छेड़ती हूँ।

तू पानी का बुलबुला है मानव; मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।।

 

 

गर्मी में मच्छरों के रूप में ख़ूब मैं तांडव करती हूँ।

पहले कालाज़ार, मलेरिया थी; अब मैं डेंगू बनती हूँ।।

 

 

प्रदूषण है सबका दुश्मन; यह बात हमेशा ही कहती हूँ।

तू पानी का बुलबुला है मानव; मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।।

 

 

बर्षा की बूँदों से अधिक मैं बिजली बन धरा पर गिरती हूँ।

मिट्टी की प्यास अब नहीं बुझाती; मानव को मैं निगलती हूँ।।

 

 

ठनका बन मैं तुम्हारे मन का बंद दरवाज़ा खोलती हूँ।

तू पानी का बुलबुला है मानव; मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।।

 

 

पिछले कुछ सालों से ठंड में स्वाइन फ़्लू बन आती हूँ।

प्रकृति पलटवार कर सकती है; घटनाओं से दर्शाती हूँ।।

 

 

छोटा भाई बन जाओ यदि तुम; मैं बहन बन सकती हूँ।

तू पानी का बुलबुला है मानव; मैं तुम्हारी प्रकृति हूँ।  :-आपका राजेश

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