#Kavita by Rajesh Kumar Singh

पति-पत्नी के रिश्ते पर नाज़ है।

पति सुर है तो पत्नी साज़ है।।

 

||पति-पत्नी||

 

दो अनजाने मिलते हैँ; संग-संग मिलकर चलते हैँ।

सुख-दुःख के साथी हैँ दोनों; गिरते और संभलते हैँ।।

 

पति का नाम भरोसा है; पत्नी का नाम समर्पण।

पति-पत्नी एक दूजे पर कर देते हैं सब अर्पण।।

 

पति के उदास होते ही पत्नी के आँसू निकलते हैँ।

सुख-दुःख के साथी हैं दोनों; गिरते और संभलते हैं।।

 

नोंक-झोंक भी इस रिश्ते की एक निशानी होती है।

रूठने और मनाने से मशहूर कहानी होती है।।

 

जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए कभी ना बदलते हैँ।

सुख-दुःख के साथी हैं दोनों; गिरते और संभलते हैँ।।

 

हम दो-हमारे दोकी घड़ी सुहानी आती है।

पुत्र पिता का, पुत्री माँ का बचपन फिर से लाती है।।

 

सोलह संस्कारों में विवाहको सब शास्त्र श्रेष्ठ समझते हैं।

सुख-दुःख के साथी हैँ दोनों; गिरते और संभलते हैँ।।

 

शादी का लड्डू वास्तव में अपना असर दिखाता है।

खानेवाला पछताता है और न खानेवाला ललचाता है।।

 

खाकर पछताने में ही फ़ायदा है; बड़े-बुज़ुर्ग यह कहते हैँ।

सुख-दुःख के साथी हैं दोनों; गिरते और संभलते हैँ।।

 

विवाह किया है तो विश्वास करना अपने जीवनसाथी पर।

कान देखना, कौआ नहीं; बात-बात पर मत जाना लड़।।

 

महल हो या जंगल; ‘सियारामजीमिलकर रहते हैं।

सुख-दुःख के साथी हैँ दोनों; गिरते और संभलते हैं।।

 

दो अनजाने मिलते हैँ; संग-संग मिलकर चलते हैँ।

सुख-दुःख के साथी हैँ दोनों; गिरते और संभलते हैँ।।

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