#Kavita by Rajeshwari Joshi

हिम शिखर सा पाषाण

बालू रेत सा तप्ता हुआ

तरलता  सा बहता हुआ

नीलाम्भ से बरसता हुआ

 

केसा हुआ है आदमी

 

वर्जनाओं में घिरा हुआ सा

दर्द ओ जख्म सहता हुआ

करम बेतुके  करता हुआ

खुद ही से अनजान सा

 

कैसा सा हुआ है आदमी

 

हवस का भूखा हुआ सा

लहू को पीता हुआ सा

रिश्वत  का भगवान बना

आंतक का साया सा हुआ

 

कैसा हुआ है आदमी

 

राजेशवरी जोशी आर्द्रा

 

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