#Kavita by Rajeshwari Joshi

अनुराग

 

 

बहती सी हवा का झोका

 

उड़ता हुआ आँचल मेरा

 

तिरछी नजरों के तीर तेरे

 

गुदगुदा जाये अंतस मेरा

 

अनुराग राग भरे उन लम्हो से

 

कुछ पल वफ़ा के चुरा लु में

 

 

रात गहरी चटक चाँदनी

 

तेरी गोद में था सर मेरा

 

हलके से तेरा बालो में हाथ फिरना

 

और थप थपाना गालों का

 

अनुराग भरे रोमाचिंत पलो से

 

कुछ सपनेसुनहरी चुरा लू में

 

 

सावन की गहरी बरसातों में

 

सोंधी मिटटी की खुशबु

 

वो इन्द्रधनुष के रंगो पर

 

बिखरी सूरज की किरणों

 

से मादक बहकता मौसम हैं

 

अनुराग भरे इस सावन से

 

कतरा कतरा महक चुरा लू में

 

 

भूली बिसरी यादों का एक

 

कारवां आ कर गुजर गया

 

खून पसीने से सिंचित रिश्तो की महकी फुलवारी अपने यौवन पर थीं चहक रही

 

जलजला समय का कुछ यूँ आया

 

अनुराग भरे इस जीवनकी

 

सोंधी बगिया का कण कण

 

बिखरा कर चला गया

 

 

अनुराग भरे इस जीवन के

 

बनते बिगड़ते रिश्तों को

 

वक़्त के लगते थपेड़ो में

 

रूहानी हसरतों को मरते देखा

 

पेबंध लगे इन रिश्तों मे

 

अस्तित्व को खोते भी देखा

 

पल पल मे दरकते रिश्तों को

 

कर तुरपाई जुड़ा लू में

 

 

 

राजेशवरी जोशी आर्द्रा

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