#Kavita by Rajeshwari Joshi

ढलती उम्र या सांसों का बोझ है,
सह नहीं पा रही जिंदगी का बोझ |
दरकते रिश्तो की कड़वाहट से बोझिल आत्मा ,
सुबकते आँसुओ का बढ़ता बोझ ,
सह नहीं पा रही जिंदगी का बोझ |
खुद के कर्मो की गति या हारती तमन्नाए,
बेबस ख्वाहिशो में फंसी
जिंदगी ,
सह नहीं पा रही जिंदगी का बोझ |
अभी कितना लम्बा हे सफर ,
कितना चलना हे बाक़ी,
समझ नहीं पा रही हे
जिंदगी |
अतीत की अँधेरी काल कोठरी में ,

कसमसाती हुई निकल नहीं पा रही बेजान जिंदगी |

राजेशवरी जोशी आर्द्रा

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