#Kavita By Rajeshwari Joshi

एक नारी की व्यथा

मुद्द्त से बंद हु में कलियों में
खुशबू बन बिखर जाने तो दो

खोई आंसमा की उचाईयों मै
मुझे बादल बन बरस जाने तो दो

क़ैद हूँ हिम शिखरों में अनंत से
निर्झर सा झरना बह जाने तो दो

पिंजरे में बंद फड़फड़ाती रही
पंछी बन नभ में उड़ जाने तो दो

कसमसाती रही उम्मीदे उम्र भर
आँसू बन आँखों से बह जाने तो दो

देहरी तकती रही सुनी डगर मुद्दत से
वो इंतजार मेरा ख़तम हो जाने तो दो

शामियाने ताने रही यादों के यारा
अब तो विरह के गीत गाने तो दो

पल पल दम तोड़ती रही हसरते इनको कफ़न मुहैया कराने तो दो

हमसफर से साथ चलने को कहा
कदम दो कदम साथ चलने तो दो |

रीता था मन मुद्द्त से प्यार की खातिर |
शंमा के मानिंद अब जल जाने तो दो |

तेरे हौसलों अल्फाजो ने हिम्मत दी
माँ अब बुलंदियों को छू जाने तो दो

राजेशवरी जोशी आर्द्रा

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