#Kavita by Rajeshwari Joshi

पलअँधियारा  पड़ीअमावस

उजालो को

तरसता मन

मखमली स्पर्श  d

छुअन अधरों की

बे काबू धड़कन

उलझी साँसे

बिता यौवन

थकी देह

अपने रूठे

सपने बीते

सन्यासी हुआ

संगम सा मन

अत्तीत में खोया

जीवनको ढोया

दुखो की गगरी

अस्तित्व पर बिखरी

पवित्र था दामन

तोहमतों का अम्बार

ओस की बूंदों सा मन

क्षितिज में अटका

भविष्य में भटका

फुलो की महक

चिडियो की चहक

हर्षित बसंत

होली के रंगो में

भीगा तन

प्रेम दिवस के

विस्मिर्त पल

पूनम का चाँद

हुआ पाखी सा

बैरागी मन |

 

राजेशवरी जोशी

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