#Kavita by Rajeshwari Joshi

दर्द छुपाती

मुस्कराती रहती

खुश रखती

 

नींदें खो देती

सपने बुनती है

उनके लिये

 

रिश्ते निभाती

अपने परायों के

सिमटती  है

 

खुद से दूर

मँजिल तलाशती

अपनी हस्ती

 

सुख ढूँढती

बेगानो के बीच में

परछाई में

 

क्या करेगी वो

छल जायेगा कोई

बिखर जानी

 

आसमां तले

खोजतीं वसुंधरा

तड़फ रही

 

नारी बन के

क्या खोया क्या पाया है

आत्म सन्मान

 

राजेशवरी जोशी

 

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