#Kavita by Rakesh Yadav Raj

कृपाण घनाक्षरी

 

रहता घर से दूर,

होता वह मजबूर,

थक कर चकनाचूर,

करे श्रम मजदूर।

 

सदा रहे परेशान,

फिर भी कर्तव्य जान,

करता कर्म महान,

करे श्रम मजदूर।।

 

वेबश है परिवार,

मजबूरी से लाचार,

छोड़े वह घर बार,

करे श्रम मजदूर।

 

रहती काम की आस,

आलस का नही दास,

करता क्रोध का नाश,

करे श्रम मजदूर।।

 

~ राकेश यादव “राज”

 

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