#Kavita by Ram Sharma Bharatpuri

जमाने की फिजा बदल रही है
जो दीपावली को खल रही है
उजाले भौनी को तरस रहे,
अंधेरों की दुकान चल रही है
जमाने की फिजा …………….1
खत्म हुई अनुशासन मर्यादा ,
चेहरे गिरगिटी हो गए
आस्तीन के सांपों को ,
बिस्तरों में लिटाकर सो गए
भाईचारा भस्म हो गया,
खामोशी आग उगल रही है
खुदगर्जी की चासनी में,
सामाजिकता पिघल रही है
जमाने की फिजा………………. 2
लूटपाट, गुंडागर्दी, अत्याचार, बलात्कार
कामचोर, मुफ्तखोर, हरामखोर, भ्रष्टाचार
इन बारूदों की सुरंगों से ,
शराफत अकेली लड रही है
उम्मीदों के दीये बुझ गए,
साजिशों की झालर जल रही है
जमाने की फिजा……………..
राम शर्मा
रसिक

Leave a Reply

Your email address will not be published.