#Kavita by Ram Sharma Bhartpuri

गमों का स्वामी 📖
” पिता”

मेरी मित्र मंडली के यारो ,
एक कविता गाता हूँ
इच्छाओ का हनन, परिवार का भरण
एक पिता सुनाता हूँ 1

1 * है दस्तूर यही इस दुनिया का ,
कि पिता सदा गंभीर रहे
सब कष्टों को वो सहता रहे,
पर आँखों से ना नीर बहे
इस पारिवारिक रणभूमि का ,
वो रणधीर बताता हूँ
त्याग तपस्या का पुजारी ,
एक पिता सुनाता हूँ
मेरे मित्र मंडली …………….
2 * निशानी सुहाग की होते है,
उदर परिवार का भरते हैं,
लहू के एक -एक कतरे में,
जीवन संस्कार भरते
इस संसारिक रचना का,
रचनाकार बताता हूँ
मेरी माँ की करवाँ चौथ का चाँद
एक पिता सुनाता हूँ
3 * पर आया समय बडा बेढंगा,
माँ-बाप को मिल रहा घर में डंडा
वो कल तक थे जीवन के सहारे,
आज बन गए हैं वो अडंगा
ओ अब तो रिश्ते खुद अपनी,
पहचान खो गए
रिश्ते रिश्ते ना रहकर ,
एक अहसान हो गऐ
मेरी मित्र मंडली के यारों
एक कविता गाता हूँ
इच्छाओं का हनन , परिवार का भरण
एक पिता सुनाता हूँ

राम शर्मा
( रसिक )
राम कुंवर शर्मा जयपुर राज.

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