#Kavita by Ram Shukla

जिन्हें खुद के पैरों पे भी खड़े होने का सलीका न था

आज वो हमे हमारी औकात बताते हैं

जानते नही वफ़ा की बातें और

हमे बे-वफ़ा का ख़िताब दिए जाते हैं

खुदगर्जी मे डूबे हैं वो और ,

मगरूर हमे कहे जाते हैं

बे-नाम धागों मे बचा है रिश्ता

उसे यूँ जार-जार किये जाते हैं

खुद को पत्थर कह मूंछो पे ताव देने वाले

दिल की आवाज सुन खुद-ब -खुद खिंचे आते थे

मगरूर है वो जश्न-ए- जीत मे इतना कि

मासूम दिल मे भी दिमाग नजर आते हैं

राम शुक्ला – जाफरगंज

9795198937

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