#Kavita by Rama Shriniwas Raj

दिल्लगी बन गयी दिल्लगी आपकी

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दिल दिल नहीं , दिल लगी आपकी,

दिल्लगी बन गयी दिल्लगी आपकी।

 

चाँद भी खेलता है ब़दरी लिये,

कि दिख जाती है चाँदनी आपकी।

 

गुज़र के वक्त़ जो जायेगी आपकी,

अश्क़ों को भाये दिल्लगी आपकी।

 

चाँद भी खेलता है ब़दरी लिये,

कि दिख जाती है चाँदनी आपकी।

 

गु़म़सुम सा चहऱा जो खड़ी सामने,

बदनसीं वो किथी बन्दगी आपकी।

 

आदमी तुम हो इऩायत़ तेरी है,

कहता हूँ वो रज़ामंदी आपकी।

 

दर्द़ ए़ दिल का दीनाऱ नहीं होता,

बफ़ा को हास़िल तिश्नगी आपकी।

 

उल्फ़तें पिरो के ऐसे जी लिए,

जैसे सींग गधे की गयी आपकी।

 

—©रामा श्रीनिवास राज‘——-

 

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