#Kavita by Ramesh Raj

बंसी बारे मोहना नंदनदन गोपाल

मधुसूदन माधव सुनौ विनती मम नंदलाल।

आकर कृष्ण मुरारी,

नैया करि देउ पार हमारी

मीरा-गणिका तुमने तारी,

कीर पड़ावत में।

चक्रव्यूह दरम्यान,

राखे कौरवदल के मान

अर्जुन कौ हरि लीनौ ज्ञान

तीर चढ़ावत में।

वस्त्र-पहाड़ लगायौ,

कौरवदल कछु समझि न पायौ

हारी भुजा अंत नहिं आयौ

चीर बढ़ावत में।

भारई की सुन टेर,

गज-घंटा झट दीनौ गेर

रामचरन प्रभु करी न देर,

वीर अड़ावत में।

[कवि रमेशराज के पिता स्व. श्री ‘लोक कवि रामचरन गुप्त’ का एक चर्चित ‘लोकगीत’ ]

 

 

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