#Kavita by Ramesh Raj

कुंडलिया छंद

बेचारी नारी बनी हारी-हारी हीर

प्रेम नहीं अब रेप है बस उसकी तकदीर ,

बस उसकी तकदीर, नीर नित नीरज नैना

अब पिंजरे के बीच सिसकती रहती मैना |

सुन रमेश हर ओर खड़े कामी व्यभिचारी

इनसे बचकर किधर जाय नारी बेचारी ||

|| रमेशराज ||

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