#Kavita by Ramesh Raj

एक बेहद मार्मिक-मुक्तछंद कविता-

।। रोटी के कबूतर ।।

रोटी के अभाव में

बच्चा सो गया भूखा

अब उसके सपनों में

उतर रही हैं रोटियां

रंग-विरंगे कबूतरों की तरह।

बच्चा खेलना चाहता है

इस कबूतरों के साथ।

बच्चा उड़ाना चाहता है

सातवें आसमान तक

इन कबूतरों को कलाबाजियां खिलाते हुए।

बेतहाशा तालियां बजाते हुए।

 

बच्चा चाहता है

कि यह रंग-विरंगे कबूतर

उसकी नस-नस में बहें

गर्म खून की तरह।

उसमें एक लपलपाता जोश भरें।

 

बच्चे के सपने अब

बदल रहे हैं लगातार।

जिस ओर बच्चा

उड़ा रहा है कबूतर,

उस ओर आकाश में

एक भीमकाय बाज उभरता है

और देखते ही देखते

चट कर जाता है सारे कबूतर।

 

अब बच्चे के सपनों में

उतर रहा है

बाज़ की नुकीली रक्तसनी

चोंच का आंतक।

बच्चा डर रहा है लगातार

बच्चा चीख रहा है लगातार

रोटियां अब छा रही है

बच्चे के सपनों में

खूंख्वार बाज की तरह।

 

आकाश में एक उड़ता हुआ

कबूतर हो गया है बच्चा,

बाज उसका पीछा कर रहा है

ल..गा…ता…र…….

 

भूख से पीडि़त बच्चे के

सपने अब तेजी से

बदल रहे हैं लगातार—-

उसके सपनों में अब

रोटिया उतर रही हैं

चील, गिद्ध, कौवों की तरह।

 

रेत पर तड़पती हुई

मछली हो गया है बच्चा

बच्चा सो गया है भूखा।।

-रमेशराज

—————————————————-

+रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001

Mo.-09634551630

Leave a Reply

Your email address will not be published.