#Kavita by Ramesh Raj

मुक्तछंद-
।। मासूम चिडि़याएं ।।
पेड़ होता जा रहा है
चालाक और चिड़ीमार।
मासूम चिडि़याएं
उसकी साजिशों की शिकार
हो जाती हैं बार-बार।

चिडि़याएं बस इतना जानती हैं कि-
पेड़ खड़ा उनका आका है
वह उन्हें छाया और फल देता है
उनके घौसलों की
हिफाजत करता है।

चिडि़याएं नहीं जानतीं कि-
जब किसी चील या बाज की
खूनी इरादों से भरी पड़ी हुई
कोई काली छाया उन पर पड़ती है
तो इस साजिश में
पेड़ की भी साझेदारी होती है।
चील और बाज से
चिडि़यों का मांस वसूलता है
चौथ के रूप में पेड़।

पेड़ के नुकीली चोंच
और पंजे नहीं होते।
हां उसके चिडि़यों के खून का
स्वाद चखने वाली
जीभ जरूर निकल आई है।

चिडि़याएं नहीं पहचानती
उस खूनी जीभ को।
चिडि़याएं बस इतना जानती हैं कि-
पेड़ उनका आका है
वह उन्हें छाया और फल देता है
उनके घौंसले महफूज रखता है।
-रमेशराज

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