#Kavita by RAmesh Raj

नवगीत
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अन्जानी पीड़ा में अब तो
मन का पोर-पोर जलता है,
गहरी होती ही जाती है धीरे-धीरे संशय-खाई।
चिंगारी देकर बुझ जाती
बार-बार प्राणों की तीली,
लगता जैसे बनी ज़िन्दगी सीली-सीली दियासलाई।

अन्तर को नित छील रहे हैं
अनसुलझे प्रश्नों के पंजे,
लगता जैसे कसे हुए है
कनपटियों को कई शिकंजे।

पीड़ा के अम्लों में गलती
गिरते ही सम्बोधन-कौड़ी,
रात वक्ष पर यूं पुर जाती झीलों को ज्यों ढकती काई।।

ऑलपिनों-सी चुभतीं हैं अब
अन्तर में आवाजें सारी,
मन में एक पेंच-सा कसती
चुपके-चुपके हर लाचारी।

सोते रहे रात-भर हम-तुम
सूरज यादों का बिसराये,
कैसे आती फिर सांसों तक परिचय की सौंधी गरमाई।
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-रमेशराज

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