#Kavita By ramesh Raj

।। एक शब्द ।।
आज यह होना ही चाहिए
कि हम सब धीरे-धीरे भूख से विलखते हुए
धुआ-धुआ होते हुए लोगों के बीच
एक शब्द टटोलें / आग
एक शब्द टटोले / आक्रोश
एक शब्द टटोलें / आन्दोलन।

अब यह हरगिज बर्दाश्त नहीं होगा
कि रामवती अपने बीमार पति की दवाओं के खातिर
या बच्चों की भूख से तिलमिलाती आंतों की खातिर
दो जून की रोटी की जुगाड़ के लिए
लाला के बहीखातों में अपनी जिदंगी गिरवीं रख आए
या किसी सेठ के यहां आधी रात
नीले बल्व की रोशनी में
रोते-रोते अपने ब्लाऊज के बटन खोले
अपनी अस्मत की नीलामी बोले।

अब हमें रामवती की भूख रुदन
और होटों से लेकर भीतर तक
दही की तरह जमी हुई चुप्पी
और सन्नाटे के बीच
तलाश करना ही होगा
एक शब्द / ज्वालामुखी
एक शब्द / विस्फोट।

इससे पहले कि आदमी को कतरा-कतरा
चूसतां हुई नपुंसक संदर्भो की जोंक
हम सबको खोखला कर दे
हमारे फौलादी जिस्मों में लुंजता भर दे
बहुत जरुरी है
उस दलाली करती हुई भाषा की पकड़
जो हमें इन जोंकों के आदमखोर कुंड में
ला पटकती है
जहां किसी कोढ़ी की तरह
नाकाम और लाचार हो जाते हैं
हमारे सोच |
जिनसे रिसता है कायरता और भिखारीपन का मवाद
अब हमें जारी करना ही होगा / एक संघर्ष,
हमारे खून और पसीने के बल पर
फलते-फूलते लोगों के खिलाफ।

अब पहचानना होगा
हर आदमखोर साफ-साफ |

दोस्त आज यह होना ही चाहिए
कि अखबारों में बलात्कार, हिंसा, डकैती
अपहरण, सितारवादन, भाषण, उद्घाटन की जगह
सुर्खिया हों –
आदमखोर भेडि़यों का कत्ल
एक और जनमेजय
एक और भगत सिंह
एक और चन्द्रशेखर
एक और सुभाष
-रमेशराज

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