#Kavita By Rameshwari Nadan

नारी सम्मान

मैं नारी हूँ प्रेम लुटाती रहूँगी
मैं नारी हूँ स्नेह बरसाती रहूँगी
चाहे लाख दो जख्म तुम मुझे
मैं नारी हूँ सदा मुस्कुराती रहूँगी

माँ बनकर आँचल में छुपाती रहूँगी
पत्नी बनकर साथ निभाती रहूँगी
तन्हा जब महसूस करोगे खुद को
प्रेमिका बनकर बहलाती रहूँगी
मैं नारी हूँ सदा मुस्कुराती रहूँगी

बहन बनकर कलाई सजाती रहूँगी
बेटी बनकर सम्मान दिलाती रहूँगी
भटक जाओगे जब मंज़िल से तुम
साथी बनकर रहा दिखाती रहूँगी
मैं नारी हूँ सदा मुस्कुराती रहूँगी

कदम दर कदम चलाना सीखती रहूँगी
घर -आँगन सदा सजाती रहूँगी
सींचती रहूँगी लहू से अपने
कोख में अपनी सदा बिठाती रहूँगी
मैं नारी हूँ सदा मुस्कुराती रहूँगी

कर्तव्य पथ पर सदा अडिग मैं
मंज़िल अपनी स्वयं बनाती रहूँगी
न समझो मुझे अबला न बेचारी
दुर्गा, लक्ष्मी , काली बनकर
धरा को पावन बनाती रहूँगी
मैं नारी हूँ सदा मुस्कुराती रहूँगी
रामेश्वरी नादान

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