#Kavita by Rameshwari Nadan

स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है
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आज रोटी बनाते हुए
ये खयाल आया
स्त्री रोटी सी है
जिसे बेला जाता है
समाज रूपी बेलन से
बेलन देता है आकार
वो बेलन के मन मुताबिक
संस्कारो के आटे में लिपटी
परि धि में बँधी
ले लेती है आकार

मायके में एक तरफ़
अधकच्चा पकाकर उसे
भेज दिया जाता ससुराल
दूसरी तरफ़ पकने के लिय
वो फ़िर से होती तैयार
दूसरी तरफ़ पकने पर
रिश्तो की गर्मी से
वो फूल जाती है
बहू, पत्नी,माँ बनकर
मर्यादा की आग में
तपकर निखर जाती है

कभी कभी जाने अनजाने में
गर जल जाये ये रोटी
कोई नहीं छूता उसे
फेंक देते है एक तरफ़
बिना जाने ये
वो खुद जली नहीं
उसे जलाया गया है
किसी के हाथो ने

न जले वो तो
उसे खा लिया जाता है
वो हर रिश्ते की भूख मिटाती है
स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है
स्त्री जब मुलायम रोटी बन जाती है
रामेश्वरी नादान
वैशाली गाज़ियाबाद

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