#Kavita by Ranjan Mishra

काव्यरंजन

लो ये जर्जर नेह-बंधन आज खुलकर खोलता हु

आज अरसे बाद फ़िर से मुक्त-पथ-पर डोलता हु

 

रोकता छन-छन रहा मैं, हाय तुम ना रुक सके हो

गर्व से ‘अकड़े’ हुये हो, इसलिए ना झुक सके हो

‘मौन’ मन की वेदना को, हो मुखर अब बोलता हु,

लो ये जर्जर नेह-बंधन आज खुलकर खोलता हु।

 

व्यर्थ मैं अपने सुझावों को युं तुमपे बोझता था

तुम अभी नादान हो कुछ,व्यर्थ ही मैं सोचता था

स्वयं अपनी भावना भी, हिय-तराजू तोलता हु,

लो ये जर्जर नेह-बंधन आज खुलकर खोलता हु।

 

ये मिठाई दरमियाँ में, हम ही घुटकर घोंटते थे

नेह की ख़ातिर व्यथा को अश्रुओं में ओटते थे

छद्म मधुमय प्रीत में मैं,सत्य-कटु को घोलता हु,

लो ये जर्जर नेह-बंधन आज खुलकर खोलता हु।

 

तुम नदी-की-धार बहती, व्यर्थ ही मैं रोकता हु

हा शुभे तुम ही सही हो बिन-वजह मैं टोकता हु

आज तुमसे क्षुब्ध होकर…..सारे नाते तोड़ता हु

हा मैं अपने आप का मन अन्य पथपर मोड़ता हु।

 

लो ये जर्जर नेह-बंधन आज खुलकर खोलता हु

आज अरसे बाद फ़िर से मुक्त-पथ-पर डोलता हु।।

–  रंजन

 

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