#Kavita by Ranjan Mishra

“विभीषण”

 

रामरोष पावक प्रचण्ड

फैला अपना आकर लिया।

रावणी-अनी आसुरी-घनी

हरि ने पल में संघार दिया।।

 

रघुनंदन का पौरुष प्रहार

अरिदल में हाहाकार हुआ।

अंतिम-छण में अंतिम-रण को

दसकन्धर भी तैयार हुआ।।

 

शीस-सुवन अर्पित करके

जो महादेव से पाया था।

उन सभी सिद्धियों को समेट-

कर रावण रण में आया था।।

 

रण प्रचण्ड भीषण ऐसा

अबतक न हुआ था धरती पर।

हरि थे अजेय,पर वह भी तो

दुर्जेय रहा था धरती पर।।

 

अब राम-क्रोध की ज्वाल

धधक कर धन्वा पर आयी थी

दसकन्धर के दसों कन्ध

धरती पर छिटकायी थी।।

 

शिव-प्रसाद से किन्तु पुनः

नव कण्ठ उगे आते थे।

कटने-उगने की यह घटना

रामादल भरमाते थे।।

 

भर गया ब्योम रामसर से

दसआनन के आनन से।

लंका समेत सारी वसुधा

बारिधि पट गये बाणन से।।

 

तन से असँख्य सोणित-नदियाँ

फूटीं सागर में लीन हुयी।

छिन्न शीश भुजदण्डों की

गरुता से पृथ्वी दीन हुयी।।

 

रावण के कटे मुण्ड चहुदिस

‘राहू’ से भय उपजाते थे।

रामादल पर मँडराते थे

नभ में सुरगण डर जाते थे।।

 

वानरसेना, लक्ष्मण, सुरगण

सब चाक्य चकित नजरों से

देख रहे थे अद्भुत रण को

दबा अधर अधरों से।।

 

‘सर’ मार रहें रघुनन्दन के

तन थकन-बिन्दु उमड़ा था।

किंन्तु अचल कज्जलगिरी सा

रावण दुर्जेय खड़ा था।।

 

हरि ने देखा पीछे,

मानो पूछा हो वहीं उसी-छन।

क्या रहस्य है दानव यह

मरता क्यों नहीं विभीषन।।

 

इधर विभीषन सहम उठा

यों हरि के नयन निहार।

मन ही मन उन्हें प्रणाम कर

करने लगा विचार।।

 

रावण रहस्य बतलाकर के

क्या आज उसे मरवा दूँ मैं

अमृत हर, उसके नाभिकुण्ड में

अग्निशिरा भरवा दूँ मैं।।

 

नहीँ नहीँ कितना पातक

कितना पापी कहलाऊंगा।

अपने सोदर भ्राता को मैं

युं स्वयं खड़ा मरवाऊंगा।।

 

देख रहा है समय आज

आख़िर में न्याय करेगा।

नाम विभीषण कुलघाती का

एक पर्याय बनेगा।।

 

भ्राता होता है पिता तुल्य

वह सब प्रकार आदर है।

गुणी,बली लंकेश वही

उसको मेरा सादर है।।

 

हरि देख रहे हैं मनोदशा

वे मुझको माफ़ करेंगे।

कुलद्रोही भाई-हंतारा बन

हम ना पाप करेंगें।।

 

हरि हैं समर्थ कर ही लेंगे

जो भी उनको करना है।

यदि ठान लिया होगा हरि ने

तो रावण को मरना है।।

 

भ्रातृ-प्रेम में इधर विभीषन

डूबा था जिस छन में।

उधर काल के वश दसकन्धर

संकित हो गया मन में।।

 

हो सकता है आज विभीषन

मेरा मरण-मरम कह दे।

हो सकता है तपसी के

बाणों में मृत्यु-अनल भर दे।।

 

मैं अगर विभीषण-वध कर दूं

कोई कुछ जान न पायेगा।

फिर तपसी की बात कहाँ

ब्रह्मा भी मार न पायेगा।।

 

रावण ने विकराल शक्ति का

तत्क्षण ही आह्वान किया।

अपने जाने निज भ्राता को

मृत ही उसने अनुमान किया।।

 

भक्त विभीषन घबराया

तब आ रघुनंदन ढाल बने।

शक्ति बाण का लक्ष्य कठिन

अब कौसिल्या के लाल बने।।

 

पल भर मूर्क्षित हो हरि सम्हले

यह देख विभीषन क्रुद्ध हुआ।

भाई भ्राता सब भूल गया

शत्रु सम जान विरूद्ध हुआ।।

 

बोला हे हरि संधान करो

इस दानव का संघार करो

मैं बतलाता हु मर्म तुम्हें

तुम इस धरती का भार हरो।।

 

यह मृत्यंजय की पूजा में

निज मस्तक काट चढ़ाया था

जिसके बदले अनगिनत शीस

यह महादेव से पाया था।।

 

नाभिकुण्ड में अमृत-घट

इसको दुर्जेय बनाता है।

नाथ दसानन का सारा बल

वहीं पे पाया जाता है।।

 

रघुनायक युं सायक मारो

जिसको ना रावण रोक सके।

दासशिस बीस भुजदण्ड कटे

नाभी का अमृत शोख़ सके।।

 

इतना कहते ही विभीषन के

आँखों से झरने लगी झरी।

हरि ने धीमी मुस्कान भरी

धन्वा पे बान कराल धरी।।

 

श्रवन-प्रजन्त खिंच करके

रघुनायक सायक छोड़ दिये।

एक साथ इकतीस काल

मानो रावण पर मोड़ दिये।।

 

एक साथ दासशिस

बीसभुजदण्ड कट गया रावण का

तीक्ष्ण-तीब्र सर लगते ही

शिव-ध्यान हट गया रावण का।।

 

फिर एक बाण पर यम बैठा

नाभी का अमृत शोख़ लिया।

रावण को अंताभाष हुआ

सारी गतिविधियां रोक दिया।।

 

मुण्ड-रुण्ड-भुजदण्ड गिरे

धरती डोली अम्बर डोला।

अंतिम-छण प्राण निकलने से

पहले रावण कुछ यूं बोला।।

 

मैं विश्वविजय दुर्जेय अमर था

हारा भाई के कारण।

रघुनन्दन तुमने भी मुझको है

मारा भाई के कारण।।

 

लक्ष्मण और विभीषण ने

संतुलन तुला का गवां दिया।

दोनों ही तुम्हारे तरफ गये

दोनों ने तुमको हवा दिया।।

 

अन्यथा जरा सोचो रघुबर

यह बाज़ी पलट भी सकती थी।

ना मेघनाद मरता ही कभी

ना नाभिकुण्ड जल सकती थी।।

 

शत्रु-मित्र दोनों में ही

भाई का कोई जोड़ नहीं।

भाई अरी में तब्दील हुआ

तो उसका कोई तोड़ नहीं।।

 

हर कठिनाई मिट जायेगी

कितना भी काम बड़ा होगा।

भाई के थके हुये बाजू

गर भाई थाम खड़ा होगा।।

 

फिर तेज उठा दसआनन का

और समा गया हरिआनन में।

सुमन वृष्टि की रघुवर पर

सुरगण समेत पंचानन ने।।

 

कृत- रंजन मिश्रा

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