#Kavita by Ranjan Mishra

नरभुजंग

क्यों चकित हो नर-भुजंगों

दंश निष्फल हो गया क्या।

तुमने हालाहल था उगला

मुझपे आ जल हो गया क्या।।

 

फूँ फूँ करते थक गये तुम

ब्यर्थ सब फुफकार तेरा।

पढ़ना अपनी साज़िशों के

माथ पर धिक्कार मेरा।

अब गरल उठता न फन से,

दंत का बल सो गया क्या।

क्यों चकित हो नर-भुजंगों

दंश निष्फल हो गया क्या।।

 

विषधरों यूँ कोटरों में

कबतलक छुप कर रहोगे।

निकलोगे भी या वहीं पर

शर्म से कुछ कर मरोगे।

गिरते ही जाते अतल में,

पग तले तल खो गया क्या।

क्यों चकित हो नर-भुजंगों

दंश निष्फल हो गया क्या।।

 

देख लो सर्पों तुम्हारे

कोष विष के चुक गये हैं।

पर अविचलित नीलकंठी

आ गले तक रुक गये है।

आये थे झलने हमें पर,

तुमसे ही छल हो गया क्या।

क्यों चकित हो नर-भुजंगों

दंश निष्फल हो गया क्या।।

– रंजन

Leave a Reply

Your email address will not be published.