#Kavita by Ranjan Mishra

काव्यरंजन  –  कृष्णऔर_धृतराष्ट्र

मैं पाण्डव का शांतिदूत

है युद्ध नहीँ चाहत मेरी

मैं निरा-प्रेम प्रस्तावक हू

है बुद्धि नहीँ दाहक मेरी।।

 

पर हाय, सुयोधन है मदान्ध

वह नहीँ समझने वाला है

कोई समझाओ,रोको उसे

कुरूराज्य दहकने वाला है।।

 

कोई न रहेगा शेष यहाँ

ऐसा रण-भीषण देख रहा

हस्तिनापुर विध्वंस हुआ

रोता है कण-कण देख रहा।

 

धृतराष्ट्र कलंकी तू होगा

सारा जग तुझ पर थूकेगा

ये पुत्रमोह तत्काल त्याग,

वरना फिर अवसर चूकेगा।।

 

क्यों नही रोकते दुर्योधन

उन्मादी महा-पातकी को

क्यों मौन समर्थन देते हो

इस पापी वंश-घातिकी को।।

 

बाह्यदृष्टि बाधित है पर

क्या अन्तरनयन भी शून्य हुआ

हा पांचाली के चीरहरण से

तुमको कौन सा पूण्य हुआ।।

 

क्या तुमको विदित नहीं राजन

जब लाक्षागृह षणयंत्र हुआ

क्या सच में भूल गये हो तुम

जब भीम-मरण परयत्न हुआ।।

 

क्या-क्या न किया दुर्योधन ने

यह पांडव-वंश मिटाने का

सब मौन देखते आये तुम

ज़हमत न किये समझाने का।।

 

कुरुकुल के ध्वज-संवाहक हे

गर तुम्हीं धरम से मुकरोगे

इतिहास के पृष्ठों पर राजन

काले वर्णों में उकरोगे।।

 

यह अंतिम-अवसर अंत घड़ी

सामने समर घहराता है

राजन विवेक से निर्णय लो

वरना तो काल बुलाता है।।

 

पुत्रमोह की कठिन जाल

पर जाल तोड़ सकते हो तुम

‘एकाकी राजा दुर्योधन’ का

ख़्याल छोड़ सकते हो तुम।।

 

बुलवाओ धर्मराज सादर

दे दो उनका अधिकार उन्हें

तुम हो समर्थ टालो अनर्थ

युग-युग देगा सत्कार तुम्हें।।

 

पर नहीं महज़ इतने ख़ातिर

तुम कैसे त्याग करोगे

जीवन भर जो सपना पाला

उस पर क्यों आग धरोगे।।

 

यह चुप्पी खुलकर बोल रही

अब युद्ध अवश्यम्भावी है

तो हमको भी स्वीकार्य यही

पर तू ही उत्तरदायी है।।

 

मैं जाता हूँ,अब कुरुक्षेत्र में

रोष दिखाई देगा

देवदत्त में पांचजन्य का

घोष सुनाई देगा ।।

 

गाण्डीवों की प्रत्यंचा पर

संघार दिखाई देगा

तुम सुनना सौ पुत्रों का भी

चीत्कार सुनाई देगा।।

 

है गुरुर जो भीष्म-पिता पर

वे भी नहीं करेंगे

जानबूझकर अपने जीवन

की आहुती धरेंगे।।

 

द्रोण-कर्ण दोनों केवल

अपना ऋण उऋण करेंगे

अपने हिस्से का रण कर के

वे भी वहीँ मरेंगे।।

 

आख़िर में दुर्योधन का भी

हाल वही होना है

तुमको टूटी जंघाओं से

लिपट-लिपट रोना है।।

 

धर्म विजय होगा आखिर में

धर्मराज नृप होंगे

सीख मिलेगी सदियों तक

धृतराष्ट्र नहीं चुप होंगे।।

 

रचनाकार: रंजन मिश्रा

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