#Kavita by Reeta Jaihind Hathrasi

प्रेमरोग   (  हास्य कविता )
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निखट्टू पति से मेरा जब से पड़ा है पाला।
सारे गहने बिक गये मेरे मौला ताला।।
सारे पैसे खत्म हुए उधारी माँगे लाला।
अल्मारी में जमा कर लगा रखे थे ताला।।
गाडी को जंग लग रही लाई थी दहेज में।
बिन पैट्रोल कैसे चलाएँ रखी जो सहेज के।।
देखो तो मुँह चिडा़ रहा अल्मारी का लाॅकर।
बिन तनख्वाह भाग गये घर के सारे नौकर।।
घर का सारा काम करते कमरिया है टूटी।
हाय- ओ- रब्बा जाने क्यों किस्मत भी रूठी।।
मुश्किल घड़ी देखो अब सर पर आन पडीं है।
मुसीबत में देखो कैसे यारों जान फँसी है।।
शादी से पहले सपन सलोने दिखलाता था।
चाँद-तारे तोड़ लाऊँ कह हमें बहलाता था।।
सोच रही बैठे रीता….कोई तिकड़म लगाऊँ।
पढाई की बी ए.बी एड नौकरी आजमाऊँ।।
जाकर के घर से बाहर कुछ ट्यूशन पढा़ऊँ।
अपना हुनर भी क्यूँ न दुनिया में आजमाऊँ।।
बात कुछ -कुछ समझ में मेरी आने लगी थी।
जैसे मुझको चुपके से कुछ समझा रही थी।।
प्रेम विवाह के चक्कर में कैसा रोग पाल लिया।
एक न मानी जब खुद को मुसीबत में डाल लिया।।
समझाते थे मात-पिता कहना  मैंने न माना।
जब चुग गई चिड़िया खेत पाछे क्या पछताना।।
रीता जयहिन्द

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