#Kavita By Reetu Devi

गुलाल
कैसे उड़ाऊँ गुलाल?
पैसे-पैसे के तरसे हम
हमारा है हाल बेहाल।
कहने को राष्ट्रनिर्माता हैं हम
वेतन न मिले महीना दर महीना
भूखे-प्यासे शरीर में
अब नहीं है दम।
द्रव अभाव भटकते यहाँ- वहाँ,
उधारियों का पहाड़ बना हर जहाँ,
फगुआ के लाल-पीले गुलाल देख,
उदास हृदय करते नजरें फेर।
विशिष्ट व्यंजन कैसे बने घर मेरे?
सूखी दाल-रोटी है नसीब मेरे।
कैसे उड़ाऊँ गुलाल?
हाल है हमारा बेहाल।
पीले परिधान पहनने के तरसते बच्चे,
झूठी दिलासा देते रहे, कब तक कच्चे
मँहगाई हमारी गला घोंटती,
झूठे वादे कर, सरकार हमारा गाल पोंछती ।
भूखे पेट न होता शिक्षण हमारा,
ऐ बड़े बाबू दे दो हक हमारा।
कैसे उड़ाऊँ गुलाल?
हाल है हमारा बेहाल।
रीतु देवी
दरभंगा, बिहार

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