#Kavita by Rifat Shaheen

मैं

सपने बन रही थी…रँग भरे सपने

क्यों?

क्योंकि कोई था जो अपनी आँखों में

इंद्र धनुषी रँग और सपनों की तूलिका लिये

आमंत्रित कर रहा था मुझे

और खींच रहा था मुझे,अपनी ओर

अपने चुम्बकीय आकर्षण से

पल प्रति पल

मैं खिंची जा रही थी,उसके पास क्षण प्रति क्षण

इतना कि वो मुझमें रंग भरने लगा

मेरे ही केशों की कालिमा

मेरी ही आँखो की नीलिमा

और मेरे ही होंटो की लालिमा से चुराया हुआ रँग

वो मुझे भ्रमित कर रहा था

ठग रहा था मुझे

और मैं

रंगों से सराबोर होने की कोरी कल्पना में खोई

धीरे धीरे ,बदरंग हो रही थी

फिर वो किसी और तस्वीर में रंग भरने लगा

तब मैंने देखा आपने आपको

और हैरान रह गई

अरे….कहाँ गया मेरा सारा रँग

कौन चुरा ले गया इन्हें

और छोड़ गया मेरे शरीर पर

कुछ बदरंग धारियां

मेरे आँचल पर गंदले धब्बे

और माथे पर लिखा ये शब्द

बदचलन

 

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