#Kavita by Rifat Shaheen

बहुत अच्छे लगे हो तुम

मैं ये इक़रार करती हूँ

तुम्हारा दिल नही देखा

न कुछ परखा,न कुछ जाना

मगर अच्छे लगे हो तुम

तेरी प्यारी सी सूरत ने मुझे दीवाना कर डाला

तुम्हारी उँगलियों के लम्स की चाहत भी है मुझको

तुम्हारे लब मुझे चूमें ये हसरत भी ,है अब मुझको

मैं ये भी चाहती हूँ तुम मुझे बाँहों में यूँ भर लो

के मेरी साँस रुक जाए

मेरी पलकें भी झुक जाएँ

बहुत अच्छे लगे हो तुम…….

तुम्हारे लम्स से ये जिस्मो जा खिल कर महक उट्ठे

तुम्हारी गर्म सांसो में पिघल जाये बदन मेरा

तेरी सरगोशियां ……..कानो में रस घोलें

बहुत अच्छे लगे हो तुम……

मगर फिर भी ये डर कैसा, झिझक कैसी, ये सहमा पन,ये बेचैनी…???

नही है खौफ दुनियाँ का ,मगर फिर भी कहीं कुछ है

जो मुझको रोकता है तुम्हारी सिम्त जाने से

वो क्या है, क्यों है, किसलिये है कुछ नही समझी

बस

बहुत अच्छे लगे हो तुम

मगर…

क्यों अच्छे लगे हो तुम….?

 

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