#Kavita by Rishabh Tomar

मिटाकर के हथेली से पुनः तेरा नाम लिखता हूँ
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तुम्हारी याद जो आई तो मैं पैगाम लिखता हूँ
मिटाकर के हथेली से पुनः तेरा नाम लिखता हूँ

सदा खोया रहा तुम में चैन से सो नही पाया
जो आई याद तेरी तो सनम मैं रो नहीं पाया
वजह बस एक ही तो थी तुम्हारी आबरू की जाँ
तभी तेरे नाम के आगे सदा गुमनाम लिखता हूँ

मिटाकर के हथेली से पुनः तेरा नाम लिखता हूँ

सलामत तुम रहो साथी दुआये रोज देता हूँ
अकेले में तुम्हें प्यारी सदाये रोज देता हूँ
भले तुम न लिखो मुझको ओ बालेकुम मेरी जाना
मगर खत में तुम्हे मैं तो सदा सलाम लिखता हूँ

मिटाकर के हथेली से पुनः तेरा नाम लिखता हूँ

मेरे कुछ दोस्त कहते है बताओ रिश्ता क्या तेरा
कोई रिश्ता भी है उससे या है पल भर का इक डेरा
तभी देने निशानी मैं मोहबत की सनम सुनलो
तुम्हारे नाम के पीछे मैं अपना नाम लिखता हूँ

मिटाकर के हथेली से पुनः तेरा नाम लिखता हूँ

मुझे चाहत में तेरी तो यहाँ नाकाम होना है
भरी महफ़िल जो झलके वही इक जाम होना है
तभी तो आज मैं खुलकर यहाँ एलान करता हूँ
तेरे आने से ही आयेगा जाँ आराम लिखता हूँ

मिटाकर के हथेली से पुनः तेरा नाम लिखता हूँ

ऋषभ तोमर

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